Sri Lanka की संसद में 22वें संवैधानिक संशोधन पर बहस तेज हो गई है। इसका मुख्य मकसद जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाना और कोर्ट ऑफ अपील का विस्तार करना है, ताकि **11 लाख** से ज्यादा पेंडिंग केसेस का निपटारा हो सके। हालांकि, इस पर सरकार और विपक्ष के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
श्रीलंका की संसद में 22वें संवैधानिक संशोधन को लेकर 2 दिनों से तीखी बहस चल रही है। सरकार का दावा है कि इसका उद्देश्य देश के प्रशासनिक संकट को सुलझाना है, जहां अदालतों में 11 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। इस प्रस्ताव के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र 67, कोर्ट ऑफ अपील के जजों की 65 और निचली अदालतों के अधिकारियों की उम्र 62 साल करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, कोर्ट ऑफ अपील में जजों की संख्या 20 से बढ़ाकर 25 करने की योजना है।
राजनीतिक समीकरण और विरोध
'National People’s Power' गठबंधन के पास 225 में से 159 सीटें हैं, यानी सरकार के पास 2/3 बहुमत है, जिससे शुक्रवार को बिल पास होना लगभग तय माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि इसके लिए जनमत संग्रह की जरूरत नहीं है। हालांकि, विपक्षी दल 'Samagi Jana Balawegaya' बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यह कदम सत्ता के केंद्रीकरण की ओर ले जाएगा और न्यायपालिका की आजादी को खतरे में डालेगा। 'Bar Association of Sri Lanka' ने भी इस संशोधन को चुनौती देते हुए 60 से अधिक याचिकाएं दाखिल की हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
श्रीलंका अपनी आर्थिक रिकवरी के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में इंस्टीट्यूशनल स्टेबिलिटी निवेशकों के लिए सबसे बड़ा पैमाना है। सरकार जहां इसे प्रशासनिक दक्षता बता रही है, वहीं कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का यह टकराव अनिश्चितता पैदा कर रहा है। UN और 'Commonwealth Lawyers Association' ने भी न्यायिक निरीक्षण को लेकर अपनी चिंताएं जताई हैं। अब पूरी दुनिया की नजर शुक्रवार को होने वाली वोटिंग पर है कि क्या यह बिल बिना किसी बड़े उपद्रव के पास हो पाएगा या देश में और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी।
