यूक्रेन के Odesa पोर्ट्स और एनर्जी ग्रिड पर हालिया हमलों से ग्लोबल सप्लाई चेन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भारत के नजरिए से देखें तो सनफ्लावर ऑयल की सप्लाई और कमोडिटी मार्केट में उठापटक सबसे बड़ा रिस्क है।
सप्लाई चेन पर बड़ा खतरा
रूसी रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को कीव और निप्रॉपेट्रोस क्षेत्र के अलावा ओडेसा के बंदरगाहों को निशाना बनाया है। यह मिलिट्री ऑपरेशन न केवल यूक्रेन की बिजली व्यवस्था को ठप कर रहा है, बल्कि समुद्री रसद (maritime logistics) को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। भारतीय निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि इसका सीधा असर ग्लोबल महंगाई पर पड़ सकता है।
भारतीय रसोई पर असर
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा सनफ्लावर ऑयल यूक्रेन से आयात करता है। यदि बंदरगाहों पर कामकाज प्रभावित होता है और एक्सपोर्ट कैपेसिटी गिरती है, तो ग्लोबल मार्केट में खाने के तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं। अगर यह दबाव बना रहा, तो भारतीय कंपनियों के लिए इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है, जिसका बोझ अंततः कंज्यूमर्स पर पड़ेगा।
एनर्जी और फ्रेट कॉस्ट में उछाल
एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का मतलब है ग्लोबल ऑयल और गैस मार्केट में अस्थिरता। जैसे ही एनर्जी की कीमतें बढ़ती हैं, शिपिंग और फ्रेट चार्जेस में भी इजाफा होता है। इसके अलावा, काला सागर (Black Sea) में तनाव बढ़ने से कार्गो जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम भी आसमान छू सकता है। युद्ध के जोखिम का यह खर्च अंततः कमोडिटीज और तैयार माल की कीमतों में जुड़ जाता है, जिससे ग्लोबल इन्फ्लेशन का दबाव बढ़ना तय है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
आने वाले दिनों में निवेशकों को क्रूड ऑयल, सनफ्लावर ऑयल की कीमतों और शिपिंग इंश्योरेंस रेट्स पर बारीक नजर रखनी होगी। यदि यूक्रेन अपनी सप्लाई चेन को सुचारू रखने में नाकाम रहता है, तो कमोडिटी मार्केट में लंबे समय तक वोलेटिलिटी बनी रह सकती है।
