Red Sea Shipping Crisis: भारत के लिए बढ़ी टेंशन, व्यापार और कच्चे तेल पर मंडराया संकट

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AuthorAditya Rao|Published at:
Red Sea Shipping Crisis: भारत के लिए बढ़ी टेंशन, व्यापार और कच्चे तेल पर मंडराया संकट

हूती विद्रोहियों द्वारा मोखा पोर्ट पर कब्जा करने से 'बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य' खतरे में पड़ गया है, जो दुनिया के **12%** ट्रेड का रास्ता है। यह तनाव ग्लोबल सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है, जिससे शिपिंग लागत और तेल की कीमतों में उछाल की आशंका है।

व्यापार के मुख्य रास्ते पर संकट

'बाब-अल-मंडेब' दुनिया के सबसे अहम शिपिंग रूटों में से एक है। मोखा पोर्ट और आसपास के द्वीपों पर हूती नियंत्रण के बाद 2022 का सीजफायर खत्म होने के संकेत मिल रहे हैं। यह स्थिति उन शिपिंग कंपनियों के लिए बड़ा सिरदर्द है जो एशिया, मिडिल ईस्ट और यूरोप के बीच अपना कारोबार करती हैं।

भारतीय निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?

भारत का यूरोप और नॉर्थ अफ्रीका के साथ व्यापार का यह सबसे छोटा रास्ता है। अगर जहाज रेड सी (Red Sea) के बजाय 'केप ऑफ गुड होप' (अफ्रीका) से होकर जाते हैं, तो यात्रा में 10 से 14 दिन का अतिरिक्त समय लगेगा। इससे न केवल फ्यूल की खपत बढ़ेगी, बल्कि शिपिंग फ्रेट (भाड़ा) में भी जबरदस्त बढ़ोतरी होगी, जिसका असर भारतीय एक्सपोर्टर और इंपोर्टर के मार्जिन पर पड़ेगा।

महंगाई का खतरा

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है। शिपिंग रूट के अस्थिर होने से तेल की ढुलाई महंगी हो सकती है। इसके अलावा, युद्ध प्रभावित इलाकों में जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम भी तेजी से बढ़ रहा है। ये दोनों कारक देश में 'इंपोर्टेड इन्फ्लेशन' (आयातित महंगाई) को हवा दे सकते हैं।

आगे क्या होगा?

यूएन दूत हंस ग्रंडबर्ग (Hans Grundberg) शांति वार्ता के लिए मस्कट और रियाद में सक्रिय हैं, लेकिन हालात अब भी अनिश्चित बने हुए हैं। फिलहाल निवेशकों को शिपिंग रेट्स और ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही, टेक्सटाइल, केमिकल और इंजीनियरिंग सेक्टर की कंपनियों के तिमाही नतीजों में लॉजिस्टिक लागत का असर साफ देखने को मिल सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.