रेड सी (Red Sea) में बढ़ते खतरों को देखते हुए ब्रिटेन ने अपनी रॉयल एयर फोर्स को सऊदी अरब की मदद के लिए तैनात किया है। यह तनाव भारतीय निवेशकों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इससे ग्लोबल शिपिंग रेट और एनर्जी इम्पोर्ट कॉस्ट प्रभावित हो सकती है।
ब्रिटिश सरकार ने रेड सी की सुरक्षा के लिए बड़े सैन्य कदम का ऐलान किया है। रॉयल एयर फोर्स अब सऊदी अरब के विमानों को 'एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग' की सुविधा देगी। हूती विद्रोहियों द्वारा किए जा रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण क्षेत्र में कमर्शियल शिपिंग और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर गहरा संकट मंडरा रहा है। प्रधानमंत्री एंडी बरहम ने स्पष्ट किया है कि यह कदम ग्लोबल सप्लाई चेन में स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाया गया है।
ग्लोबल ट्रेड पर असर
दुनिया का लगभग 12% ट्रेड रेड सी और स्वेज नहर के रास्ते होता है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने से शिपिंग कंपनियां या तो खतरनाक रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं, जिससे इंश्योरेंस प्रीमियम और ऑपरेशनल लागत बढ़ जाती है, या फिर उन्हें 'केप ऑफ गुड होप' का लंबा रास्ता चुनना पड़ता है। लंबा रास्ता अपनाने से फ्यूल की खपत बढ़ती है और सामान की डिलीवरी में देरी होती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ता है।
भारतीय निवेशकों के लिए मायने
भारत अपनी क्रूड ऑयल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है। रेड सी में किसी भी तरह की रुकावट से आयात बिल (Import Bill) बढ़ सकता है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) जैसी कंपनियों के शेयरधारकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल है, क्योंकि शिपिंग और इंश्योरेंस लागत कच्चे तेल की कुल लागत का बड़ा हिस्सा होती हैं। इसके अलावा, इंजीनियरिंग, टेक्सटाइल और फार्मा सेक्टर की एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों को भी लॉजिस्टिक्स की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों को ग्लोबल ऑयल प्राइस और शिपिंग फ्रेट इंडेक्स पर बारीक नजर रखनी होगी।
