पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' को आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इस समझौते का मकसद रीजनल सिक्योरिटी प्रोटोकॉल को एक करना है, लेकिन पाकिस्तान जैसे देशों के भारी-भरकम डिफेंस बजट को देखते हुए निवेशक अब देश की फिस्कल स्टेबिलिटी को लेकर सतर्क हो गए हैं।
डिफेंस पैक्ट से बदलेंगे सिक्योरिटी समीकरण
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की अब 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' को पूरी तरह से ऑपरेशनल बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 7 अगस्त 2026 को साइन किए गए इस समझौते के तहत, अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस व्यवस्था को संभालने के लिए सऊदी अरब में एक परमानेंट सचिवालय (Secretariat) बनाया जा रहा है, जिसकी कमान शुरुआती 3 साल के लिए पाकिस्तान के हाथों में होगी।
आर्थिक चुनौतियों का डर
निवेशकों और मार्केट एनालिस्ट्स की नजर इस बात पर टिकी है कि इस सुरक्षा समझौते का इन देशों की फिस्कल हेल्थ पर क्या असर पड़ेगा। पाकिस्तान के लिए स्थिति थोड़ी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए उसका डिफेंस बजट पहले ही ₹3.01 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर है।
क्या बजट पर पड़ेगा दबाव?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस जॉइंट डिफेंस फ्रेमवर्क को बनाए रखने के लिए डिफेंस आउटले (Defense Outlay) और बढ़ाना पड़ा, तो इंफ्रास्ट्रक्चर, एजुकेशन और कर्ज चुकाने जैसे जरूरी कामों के लिए फंड कम पड़ सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स इसे 'फिस्कल डिसिप्लिन' के नजरिए से देख रहे हैं। अगर सरकारी खर्च बढ़ता है, तो भविष्य में कर्ज के बोझ (Debt Sustainability) को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।
अगले कुछ महीनों में इस समझौते के तहत होने वाली परियोजनाओं और इससे जुड़े खर्चों का ब्योरा सामने आना बाकी है, जो यह तय करेगा कि यह एग्रीमेंट स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप बनकर रहेगा या सदस्य देशों की इकोनॉमी पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालेगा।
