पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में छिड़े घमासान ने वहां की सरकार और सेना के बीच की गहरी दरार को उजागर कर दिया है। विपक्षी नेता मौलाना फजलुर रहमान ने सवाल उठाया है कि आखिर क्यों सरकार को दरकिनार कर आर्मी चीफ ने तेहरान में हाई-लेवल डिफेंस वार्ता की।
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में इस हफ्ते उस वक्त तनाव बढ़ गया, जब विपक्षी नेता मौलाना फजलुर रहमान और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बीच तीखी बहस हुई। यह पूरा विवाद 26 अक्टूबर को तेहरान में हुई एक डिप्लोमैटिक मीटिंग को लेकर है, जहां पाकिस्तान के डिफेंस फोर्सेज के चीफ आसिम मुनीर ने सऊदी अरब और तुर्की के समकक्षों के साथ मुलाकात की थी। इस बैठक में सरकार का कोई भी प्रमुख नागरिक अधिकारी मौजूद नहीं था।
संसद बनाम सेना: अधिकारों की लड़ाई
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में चुनी हुई संसद को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट (Makkah Joint Defence Agreement) के तहत की गई प्रतिबद्धताओं पर संसद की निगरानी क्यों नहीं है।
सरकार का पक्ष
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि तेहरान की बैठकें रक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं थीं, बल्कि यह शांति बहाली के लिए सेना का स्वतंत्र डिप्लोमैटिक प्रयास था। उन्होंने इस विवाद को पूरी तरह से 'राजनीति से प्रेरित' करार दिया और बताया कि 'बद्र मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (Badr MoU) जैसे आधिकारिक समझौते अभी भी मंत्रालय के अधीन ही काम कर रहे हैं।
निवेशकों और मार्केट के लिए क्या हैं मायने?
पाकिस्तान की राजनीतिक अनिश्चितता हमेशा से वहां के कारोबारी माहौल के लिए एक बड़ा रिस्क रही है। जब सत्ता के दो प्रमुख केंद्रों यानी सरकार और सेना के बीच सार्वजनिक रूप से मतभेद उभरते हैं, तो यह पॉलिसी की निरंतरता (Policy Continuity) पर सवाल खड़े करता है। दक्षिण एशियाई क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता के लिए यह कशमकश चिंता का विषय बनी हुई है। मार्केट हमेशा एक स्पष्ट और स्थिर सत्ता को प्राथमिकता देता है, ऐसे में निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार और सेना के बीच यह 'डुअल-पावर' डायनेमिक आने वाले समय में स्थिर रह पाएगा या फिर इससे और भी बड़े विवाद जन्म लेंगे।
