पाकिस्तान के पूर्व अधिकारी मजहर जमील ने भारत की न्यूक्लियर पॉलिसी पर बेबुनियाद सवाल उठाए हैं। हालांकि, भारतीय शेयर बाजार पर ऐसे भू-राजनीतिक दावों का असर कम ही देखने को मिलता है क्योंकि मार्केट का फोकस घरेलू मैक्रो-इकोनॉमिक ग्रोथ और कंपनियों के नतीजों पर बना हुआ है।
लंदन में एक कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान के नेशनल कमांड अथॉरिटी के पूर्व सलाहकार, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) मजहर जमील ने भारत की सुरक्षा नीतियों पर विवादित बयान दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अपनी पुरानी 'नो फर्स्ट यूज़' (No First Use) पॉलिसी से हट रहा है, जो कि पूरी तरह से तथ्यात्मक रूप से गलत है।
भारत का रुख स्पष्ट
भारत ने 1990 के दशक के अंत से ही अपनी 'नो फर्स्ट यूज़' नीति को मजबूती से अपनाया हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत कभी भी किसी संघर्ष में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने वाला पहला पक्ष नहीं होगा। भारत की सामरिक शक्ति केवल 'क्रेडिबल मिनिमम डेटरेंस' (Credible Minimum Deterrence) यानी जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है। विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस मिसाइलों को लेकर किए गए दावे भी निराधार हैं और ये केवल भ्रामक प्रचार का हिस्सा हैं।
पाकिस्तान का अपना आंतरिक संकट
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान पाकिस्तान में सैन्य शासन के भीतर आए बदलावों पर भी चर्चा हुई है। वहां 'नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड' के गठन के बाद परमाणु हथियारों का पूरा नियंत्रण सैन्य नेतृत्व के हाथों में सिमट गया है, जो कि अधिकांश परमाणु शक्ति संपन्न देशों की लोकतांत्रिक प्रणाली के बिल्कुल विपरीत है।
बाजार पर असर
इन्वेस्टर अक्सर ऐसे बयानों को 'नॉइज़' (Noise) मानते हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय शेयर बाजार ऐसी भू-राजनीतिक तनातनी के बावजूद काफी लचीला रहा है। मार्केट का फोकस RBI की ब्याज दरें, जीडीपी ग्रोथ और कंपनियों के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर होता है। अनुभवी निवेशकों के लिए ऐसे बयानों से घबराने के बजाय भारत की आर्थिक मजबूती और घरेलू डिमांड पर भरोसा बनाए रखना ही फायदेमंद रहा है।
