नई दिल्ली में चल रहे 18वें BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बातचीत हो रही है। इस बैठक में मुख्य रूप से बॉर्डर पर शांति और **$112 बिलियन** के ट्रेड डेफिसिट जैसे बड़े आर्थिक मुद्दों पर फोकस किया जा रहा है।
ऐतिहासिक मुलाकात और आर्थिक मुद्दे
सात साल बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा ने हलचल बढ़ा दी है। 18वें BRICS समिट के इतर हो रही यह बातचीत न केवल कूटनीतिक दृष्टि से, बल्कि बाजार के लिहाज से भी बेहद अहम है। चर्चा का मुख्य केंद्र बॉर्डर पर स्थिरता और दोनों देशों के बीच जटिल होते आर्थिक संबंध हैं।
ट्रेड डेफिसिट की चिंता
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा $112 बिलियन का ट्रेड डेफिसिट है, जो फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में दर्ज किया गया था। भारत की मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी क्षेत्र, कच्चा माल और पुर्जों के लिए चीन पर काफी निर्भर हैं। इस निर्भरता के कारण भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर सप्लाई चेन में बाधा आती है और इनपुट कॉस्ट में इजाफा होता है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है।
आगे की राह और पॉलिसी अपडेट्स
भारत सरकार अपनी प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के जरिए स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रही है। हालांकि अभी सरकार चीनी निवेश को लेकर सतर्क है, लेकिन बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या बिजनेस वीजा और ट्रेड बैरियर में कोई ढील दी जाएगी।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक बॉर्डर पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं होते, तब तक किसी बड़े पॉलिसी बदलाव की उम्मीद कम है। फिर भी, कंपनियों को सप्लाई चेन में विविधता लाने (Diversification) के अपने प्रयासों को जारी रखना होगा। निवेशकों को फिलहाल किसी भी ठोस सरकारी ऐलान का इंतजार करना चाहिए, क्योंकि वही आने वाले समय में मशीनरी और कच्चे माल की लागत तय करेगा।
