नेपाल ने ग्लेशियर फ्लड (Glacial Flood) से हुई भीषण तबाही के बाद अंतरराष्ट्रीय मदद की गुहार लगाई है। इस आपदा में देश को अपनी GDP के **10%** के बराबर आर्थिक नुकसान हुआ है और **1,450** से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने कर्ज लेने से साफ इनकार करते हुए सिर्फ ग्रांट-बेस्ड फंड की मांग की है।
आर्थिक तबाही का मंजर
अगस्त के अंत में चीन की सीमा के पास आई इस आपदा ने नेपाल की कमर तोड़ दी है। रिकवरी और पुनर्निर्माण का कुल खर्च देश की GDP का 10% आंका गया है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि इतने बड़े संकट के समय हाई-इंटरेस्ट वाला कर्ज लेना देश की आर्थिक स्थिति के लिए घातक हो सकता है, इसलिए नेपाल केवल ग्रांट (अनुदान) की मांग कर रहा है।
वर्ल्ड बैंक की मदद और चुनौतियां
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) में नेपाल ने कहा कि इमरजेंसी फाइनेंसिंग का मौजूदा मॉडल बदलने की जरूरत है। फिलहाल वर्ल्ड बैंक ने $17 करोड़ की आपातकालीन मदद को मंजूरी दी है, लेकिन सरकार और भी ग्रांट्स पर जोर दे रही है ताकि देश के बैलेंस शीट पर कर्ज का दबाव न बढ़े। आपदा के कारण सड़कें, स्कूल और घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं।
हिमालयन फ्रेमवर्क की जरूरत
इस संकट ने नेपाल, भारत और चीन के बीच क्लाइमेट रिस्क मैनेजमेंट पर नई बहस छेड़ दी है। हिमालयी क्षेत्र में सैटेलाइट मॉनिटरिंग और अर्ली-वार्निंग प्रोटोकॉल के लिए एक साझा फ्रेमवर्क बनाने का प्रस्ताव जोर पकड़ रहा है। यह क्रॉस-बॉर्डर डेटा शेयरिंग भविष्य में ऐसी आपदाओं से जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए अहम मानी जा रही है।
मानवीय संकट अभी भी बरकरार
अभी भी 6,000 से ज्यादा लोग लापता हैं और सर्च ऑपरेशन लगातार जारी है। निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय नेपाल की ग्रांट की मांग को स्वीकार करेगा और क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग का नया खाका तैयार हो पाएगा या नहीं।
