प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेशेल्स में 'क्लाइमेट जस्टिस' और समुद्री सुरक्षा पर जोर देकर भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और डिफेंस (Defense) कंपनियों के लिए बड़े मौके खोल दिए हैं। भारत, ग्लोबल साउथ देशों के लिए ग्रीन एनर्जी और क्षेत्रीय सुरक्षा में एक अहम पार्टनर बनकर उभर रहा है, जिससे लोकल टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग प्लेयर्स की इंटरनेशनल एक्सपेंशन को बूस्ट मिलेगा।
क्या हुआ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करते हुए कहा कि ग्लोबल साउथ के आइलैंड देशों को 'क्लाइमेट जस्टिस' की सख़्त ज़रूरत है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये देश जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं और इसके लिए सबको मिलकर एक समान कार्रवाई करनी चाहिए।
पर्यावरण के मुद्दों के अलावा, पीएम मोदी ने हिंद महासागर (Indian Ocean) में समुद्री सुरक्षा को लेकर एक विजन पेश किया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि, आपसी विश्वास और सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है। पीएम मोदी ने यह भी बताया कि भारत इंटरनेशनल सोलर अलायंस (International Solar Alliance) और ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस (Global Biofuels Alliance) जैसे पहलों के ज़रिए स्थायी विकास (Sustainable Growth) के मॉडल पेश कर रहा है।
रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर पर असर
भारतीय निवेशकों के लिए, इंटरनेशनल ग्रीन एनर्जी अलायंस जैसे ISA और ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस बहुत अहमियत रखते हैं। ये प्लेटफॉर्म भारतीय कंपनियों के लिए रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग स्किल्स और सोलर इक्विपमेंट को पार्टनर देशों में एक्सपोर्ट करने का ज़रिया बन सकते हैं। जैसे-जैसे भारत अपने रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट्स को पूरा करने के लिए क्षमता बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे ग्लोबल साउथ देशों को टेक्नोलॉजी सप्लाई करने से डोमेस्टिक फर्म्स के लिए कमाई का एक नया जरिया खुल रहा है। सोलर मैन्युफैक्चरिंग, बायोफ्यूल प्रोडक्शन और सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियां इन अलायंस के ज़रिए प्रोजेक्ट कॉन्ट्रैक्ट्स और एक्सपोर्ट के मौके भुना सकती हैं।
समुद्री सुरक्षा और डिफेंस के मौके
हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा पर ज़ोर देने का सीधा असर भारत के डिफेंस (Defense) और शिपबिल्डिंग (Shipbuilding) सेक्टर पर पड़ेगा। समुद्री पड़ोसियों के साथ सहयोग बढ़ने का मतलब है कि क्षमता निर्माण (Capacity Building), गश्ती नौकाओं (Patrol Vessels) की सप्लाई और समुद्री निगरानी (Maritime Surveillance) के उपकरणों में ज़्यादा पार्टनरशिप की ज़रूरत होगी। भारतीय डिफेंस शिपयार्ड और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माता, जो भारतीय नौसेना को सपोर्ट करते हैं, अक्सर क्षेत्रीय समुद्री संबंधों को मज़बूत करने से गश्ती नौकाओं, कम्युनिकेशन सिस्टम और सर्विलांस रडार के लिए एक्सपोर्ट ऑर्डर हासिल करते हैं। यह कूटनीतिक पहल भारतीय डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स के लिए डोमेस्टिक डिमांड से आगे बढ़कर अपना कारोबार बढ़ाने का एक ज़रिया बन सकती है।
बिज़नेस के लिहाज़ से हकीकत
हालांकि कूटनीतिक स्तर पर रास्ते खुल रहे हैं, निवेशकों को सरकारी प्रतिबद्धताओं (Government-level Commitments) और प्राइवेट कंपनियों के असल ऑर्डर बुक ग्रोथ के बीच फर्क समझना होगा। किसी एमओयू (MoU) या कूटनीतिक गठबंधन को एक कॉमर्शियल प्रोजेक्ट में बदलने के लिए समय, फाइनेंसिंग और होस्ट देशों के लोकल रेगुलेटरी हर्डल्स से गुज़रना पड़ता है। इस क्षेत्र में कंपनियों के लिए भारत की कॉम्पिटिटिव और हाई-क्वालिटी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजी सप्लाई करने की काबिलियत ही असली परीक्षा होगी। इसी तरह, डिफेंस सेक्टर में, कंपनियों की ग्लोबल कॉम्पिटिशन के बीच इंटरनेशनल डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने और उन्हें पूरा करने की क्षमता पर फोकस बना रहेगा।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
इन डेवलपमेंट पर नज़र रखने वाले निवेशक इन बातों पर ध्यान दे सकते हैं:
- उन डिफेंस शिपयार्ड्स के ऑर्डर बुक में वृद्धि जो एक्सपोर्ट मार्केट को टारगेट कर रहे हैं।
- ISA या ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस के तहत इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स में भारतीय रिन्यूएबल एनर्जी फर्म्स की भागीदारी।
- हिंद महासागर क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए फंडिंग या क्रेडिट लाइन्स का ज़िक्र करने वाले सरकारी समझौतों पर नज़र रखें।
- मैनेजमेंट से आने वाली कमेंट्री, खासकर इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स की एग्जीक्यूशन और एक्सपोर्ट रेवेन्यू ग्रोथ को लेकर।
