18वें BRICS समिट में पीएम नरेंद्र मोदी ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स का इस्तेमाल 'हथियार' की तरह करना दुनिया की तरक्की के लिए घातक है। उन्होंने देशों से मजबूत और लचीली सप्लाई चेन बनाने की अपील की है, जो EV और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए बेहद अहम है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर एक बड़ा बयान दिया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में पीएम मोदी ने साफ कर दिया कि क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट) को भू-राजनीतिक दबाव बनाने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।
निवेशकों के लिए क्यों है यह बड़ी खबर?
यह चेतावनी सीधे तौर पर भारतीय कंपनियों के लिए एक रिस्क फैक्टर की ओर इशारा करती है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस जैसे सेक्टर कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं। अगर दुनिया भर में इन मिनरल्स की सप्लाई को लेकर खींचतान बढ़ती है, तो कंपनियों की प्रोडक्शन कॉस्ट में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है। पीएम की 'रेजिलिएंस' (लचीलेपन) पर जोर देने की बात यह दर्शाती है कि भारत अब सप्लाई चेन में विविधता लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
नए इनिशिएटिव और भविष्य की राह
समिट में चार मुख्य स्तंभों - रेजिलिएंस, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी पर चर्चा हुई। इन लक्ष्यों को हकीकत में बदलने के लिए BRICS Incubator Network शुरू करने का ऐलान किया गया है, जो सदस्य देशों के स्टार्टअप्स को आपस में जोड़ेगा। साथ ही, BRICS Startup Innovation Fund का भी प्रस्ताव रखा गया है, ताकि नई कंपनियों को फंडिंग की कमी न हो।
इसके अलावा, भविष्य की हेल्थ इमरजेंसी से निपटने के लिए एक 'इंटीग्रेटेड अर्ली वार्निंग सिस्टम' को संस्थागत रूप देने पर भी सहमति बनी है। कुल मिलाकर, BRICS का रुख अब पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करके खुद का एक स्वतंत्र आर्थिक ढांचा तैयार करने की तरफ झुक रहा है। निवेशकों को अब इन समझौतों के जमीन पर उतरने का इंतजार करना होगा, क्योंकि असली फायदा तभी मिलेगा जब ये नीतियां कंपनियों के ऑपरेशनल रिस्क को कम करेंगी।
