मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच US Department of State ने ट्रेवल वार्निंग जारी की है। हूती विद्रोहियों के मिसाइल हमलों से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अस्थिरता का डर बढ़ गया है, जिसका असर भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और महंगाई दर पर पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में हूती विद्रोहियों की ओर से लगातार किए जा रहे मिसाइल हमलों के बाद स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। रियाद के पास मिसाइल इंटरसेप्ट किए जाने के बाद से अमेरिका ने सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया है। इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर ग्लोबल एनर्जी मार्केट और भारत की उन कंपनियों पर पड़ना तय है, जिनका व्यापार इस क्षेत्र से जुड़ा है।
कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। लाल सागर (Red Sea) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने पर सप्लाई चेन में बाधा आ सकती है। शिपिंग बीमा प्रीमियम और फ्रेट कॉस्ट बढ़ने से सीधे तौर पर ग्लोबल ऑयल कीमतों में तेजी आएगी, जिससे भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।
किन कंपनियों पर पड़ेगा असर?
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): Bharat Petroleum, Hindustan Petroleum, और Indian Oil के मार्जिन पर दबाव दिख सकता है, क्योंकि अचानक आई तेजी के बाद रिटेल फ्यूल कीमतों में बदलाव करना चुनौतीपूर्ण होता है।
- अपस्ट्रीम उत्पादक: Oil and Natural Gas Corporation (ONGC) और Oil India जैसी कंपनियों के रियलाइजेशन पर ग्लोबल प्राइस ट्रेंड के हिसाब से असर पड़ेगा।
- इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन: Larsen & Toubro (L&T) जैसी दिग्गज कंपनियां, जिनका सऊदी अरब और UAE जैसे देशों में बड़ा एक्सपोजर है, उन्हें प्रोजेक्ट में देरी या बढ़ते खर्चों का सामना करना पड़ सकता है।
मैक्रो इकोनॉमिक रिस्क
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर रुपये (Rupee) की स्थिरता पर भी पड़ेगा। यदि रुपया कमजोर होता है और तेल महंगा रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए इन्फ्लेशन को कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है। फिलहाल निवेशक इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि प्रमुख भारतीय कंपनियां अपनी अगली तिमाही के नतीजों में इस क्षेत्र के ऑपरेशंस को लेकर क्या गाइडेंस देती हैं।
