रूस ने आधिकारिक तौर पर डॉलर को हटाने की किसी भी योजना से इनकार किया है। मॉस्को का कहना है कि नेशनल करेंसी का इस्तेमाल सिर्फ पाबंदियों से बचने के लिए एक मजबूरी है। दिल्ली में होने वाले BRICS समिट से पहले अमेरिका की **100%** टैरिफ की धमकी ने भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दमित्री पेसकोव ने साफ कर दिया है कि रूस का डी-डॉलराइजेशन (de-dollarization) का कोई एजेंडा नहीं है। मॉस्को के मुताबिक, वेस्टर्न फाइनेंशियल नेटवर्क से बाहर होने के बाद नेशनल करेंसी का इस्तेमाल एक 'प्रैक्टिकल जरूरत' बन गई है। यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी सीनेट ने रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का बिल पेश किया है।
एनर्जी ट्रेड पर अमेरिका की नजर
अमेरिका का यह कदम इमर्जिंग मार्केट इकोनॉमीज के लिए बड़ी चुनौती है। ये प्रस्तावित टैरिफ रूस के साथ व्यापार को हतोत्साहित करने के लिए लाए जा रहे हैं। भारतीय कंपनियां, जो कच्चा तेल आयात करती हैं या डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल हैं, अब सेकेंडरी सैंक्शंस (secondary sanctions) के डर और सप्लाई चेन में आने वाली दिक्कतों के बीच फंसती नजर आ रही हैं।
BRICS समिट और भारत का एंगल
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर, 2026 को होने वाले 18वें BRICS समिट में जियोपॉलिटिकल तनाव का असर साफ दिखेगा। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाकात में रेयर अर्थ मिनरल्स और सुखोई Su-57 फाइटर जेट की बिक्री पर चर्चा हो सकती है। फिलहाल, रूस और BRICS देशों के बीच 90% ट्रेड लोकल करेंसी में हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद पेमेंट सेटलमेंट में काफी दिक्कतें आ रही हैं।
भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि रूसी फर्मों के पास बड़ी मात्रा में भारतीय रुपये जमा हो गए हैं, जिन्हें न तो कन्वर्ट करना आसान है और न ही वापस भेजना।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या अपकमिंग समिट में करेंसी कन्वर्जन के लिए कोई बेहतर ढांचा तैयार होता है या नहीं। यदि अमेरिका का टैरिफ का खतरा बरकरार रहता है, तो भारत को अपनी प्रोक्योरमेंट स्ट्रेटेजी बदलनी पड़ सकती है, जिसका सीधा असर रूस के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों के मुनाफे और ऑपरेशनल लागत पर पड़ेगा।
