ईरान ने ग्लोबल फ्यूल की कीमतों और शिपिंग में बाधाओं के लिए अमेरिका के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। भारतीय निवेशकों के लिए यह तनाव 'Strait of Hormuz' से जुड़ी सप्लाई चेन पर बड़ा रिस्क पैदा कर रहा है।
ईरानी विदेश मंत्रालय ने ग्लोबल फ्यूल प्राइस में अस्थिरता के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने पर अमेरिकी आरोपों को गलत बताया है। यह कूटनीतिक विवाद न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र से ठीक पहले सामने आया है। तेहरान का तर्क है कि अमेरिका अपनी गलत नीतियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और एनर्जी मार्केट
निवेशकों की चिंता का मुख्य केंद्र 'Strait of Hormuz' है। यह समुद्री रास्ता दुनिया भर के तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण 'चोकपॉइंट' है। रोजाना ग्लोबल क्रूड ऑयल का एक बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है। यहां बढ़ते तनाव से क्रूड ऑयल फ्यूचर्स में अचानक बड़े उछाल की संभावना बनी रहती है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से ज्यादा हिस्सा इंपोर्ट करता है, इसलिए इस क्षेत्र में शांति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं, जिससे 'करंट अकाउंट डेफिसिट' पर दबाव पड़ता है और रुपया कमजोर हो सकता है। बढ़ती महंगाई के कारण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को सख्त मॉनेटरी पॉलिसी अपनानी पड़ सकती है, जिसका सीधा असर कंपनियों की बोरिंग कॉस्ट (उधार लागत) पर पड़ेगा।
सेक्टर का हाल
तेल की कीमतों में उछाल का असर अलग-अलग सेक्टर पर अलग-अलग होगा:
- OMCs: पेट्रोल-डीजल के दाम न बढ़ने पर इनके मार्जिन घट सकते हैं।
- इंपैक्ट वाले सेक्टर: पेंट, टायर, एविएशन और केमिकल्स जैसी कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
- फायदे वाले सेक्टर: अपस्ट्रीम ऑयल एक्सप्लोरेशन कंपनियां, जिन्हें कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से बेहतर रियलाइजेशन मिलता है।
निवेशकों को अब Brent Crude की कीमतों और UNGA के बयानों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
