ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने ग्लोबल मार्केट में हलचल मचा दी है। तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड **$98** प्रति बैरल के पास पहुंच गया है, जिससे भारतीय निवेशकों के लिए इंपोर्ट बिल और महंगाई का खतरा बढ़ गया है।
तनाव क्यों बढ़ा?
सोमवार को ईरान की ओर से अमेरिकी नौसैनिक जहाजों पर मिसाइलों की दूसरी खेप दागने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान से जुड़े तीन ऑयल टैंकरों—M/T Downy, M/T Stark 1 और M/T Kylo को पूरी तरह बेकार कर दिया है। ईरान ने अब 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के पास मैरीटाइम एक्सक्लूजन ज़ोन बनाने की धमकी दी है, जो दुनिया भर में तेल और गैस सप्लाई की सबसे अहम नस मानी जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर मार
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर देश के इम्पोर्ट बिल को बढ़ाएगा। इसके चलते रुपये पर दबाव बढ़ेगा और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) का खतरा पैदा हो सकता है। यह स्थिति रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए इंटरेस्ट रेट्स को लेकर मुश्किलें खड़ी कर सकती है, क्योंकि बढ़ती महंगाई ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं को सीमित कर देती है।
किन सेक्टर्स पर होगा बुरा असर?
- ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): अगर कंपनियां बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो मार्जिन पर बुरा असर पड़ेगा।
- एविएशन और ट्रांसपोर्ट: ईंधन की बढ़ती लागत से इन सेक्टर्स का ऑपरेटिंग खर्चा बढ़ जाएगा, जिसका असर सीधे उनकी तिमाही नतीजों (Quarterly Earnings) पर दिखेगा।
- पेंट और केमिकल: ये कंपनियां पेट्रोलियम डेरिवेटिव्स का उपयोग कच्चे माल के रूप में करती हैं, इसलिए लागत बढ़ना इनके लिए बड़ा सिरदर्द है।
फिलहाल, मार्केट की नजरें 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की स्थिरता पर टिकी हैं। अगर यह तनाव लंबा खिंचता है, तो यह केवल सप्लाई चेन को ही बाधित नहीं करेगा, बल्कि कंज्यूमर स्पेंडिंग और कंपनियों के मुनाफे पर भी पानी फेर सकता है।
