New Delhi में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS समिट की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं, लेकिन Iran और UAE के बीच बढ़ते राजनयिक विवाद ने भारत की चुनौतियों को बढ़ा दिया है। UAE द्वारा Iran पर लगाए गए ट्रेड और फाइनेंशियल एम्बार्गो ने गुट की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर है।
भारत इस समय 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS समिट के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दो सदस्य देशों, Iran और UAE के बीच बढ़ता विवाद एक बड़ी बाधा बन गया है। विवाद की जड़ 19 अगस्त को UAE द्वारा Iran पर लगाया गया अनिश्चितकालीन व्यापार, वाणिज्यिक और वित्तीय एम्बार्गो है। UAE सरकार ने ईरान पर समुद्री यातायात पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले का आरोप लगाया है, जबकि तेहरान ने इसे विदेशी ताकतों की साजिश बताते हुए खारिज कर दिया है।
ग्लोबल ट्रेड और एनर्जी पर असर
यह विवाद सिर्फ राजनयिक नहीं है, बल्कि ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स के लिए भी चिंताजनक है। 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) दुनिया की तेल और गैस सप्लाई की मुख्य धमनियों में से एक है। इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव सप्लाई चेन को बाधित कर सकता है, जिससे क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और शिपिंग लागत बढ़ सकती है। भारतीय निवेशकों के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि तेल की कीमतों में बदलाव देश के इंपोर्ट बिल, महंगाई और केमिकल, ट्रांसपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग जैसे एनर्जी-इंटेंसिव सेक्टर के मुनाफे को सीधा प्रभावित करता है।
BRICS के सामने चुनौतियां
BRICS विस्तार के बाद अब इसमें 11 सदस्य शामिल हैं, जिनके आर्थिक और राजनीतिक एजेंडे काफी अलग-अलग हैं। अलग-अलग मतों के कारण एक साझा रुख अपनाना मुश्किल होता जा रहा है। मई 2026 में हुई विदेश मंत्रियों की बैठक का नतीजा भी इसका प्रमाण है, जहां सदस्यों के बीच सहमति न बन पाने के कारण कोई संयुक्त घोषणापत्र जारी नहीं हो सका था।
भारत, 2026 के चेयरमैन के रूप में इन मतभेदों को सुलझाने का प्रयास कर रहा है। इस साल की थीम 'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, को-ऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' है, जिसकी सफलता पूरी तरह से गुट की एकता पर निर्भर करती है। निवेशकों और मार्केट ऑब्जर्वर्स के लिए सितंबर का समिट बेहद अहम होगा, क्योंकि यह समिट ही तय करेगा कि BRICS का भविष्य क्या होगा और ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी में यह गुट कितना प्रभावी रह पाएगा।
