Western देशों ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर उसे UN Security Council भेजने की तैयारी शुरू कर दी है। ईरान द्वारा साइट इंस्पेक्शन न करने और यूरेनियम स्टॉकपाइल बढ़ने से उपजे इस तनाव का सीधा असर भारतीय निवेशकों और ग्लोबल क्रूड ऑयल कीमतों पर पड़ सकता है।
कूटनीतिक तनाव का बढ़ता दायरा
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी मिलकर एक औपचारिक प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं ताकि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के मामले को UN Security Council में ले जाया जा सके। यह कदम तब उठाया गया है जब तेहरान ने International Atomic Energy Agency (IAEA) को अपनी प्रमुख न्यूक्लियर साइट्स तक पहुंच देने से इनकार कर दिया है।
क्यों बढ़ी है चिंता?
साल 2025 के क्षेत्रीय संघर्षों के बाद से तनाव जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पास 60% शुद्धता तक एन्रिच्ड यूरेनियम का बड़ा भंडार है। हालांकि यह हथियारों के लिए जरूरी 90% के स्तर से कम है, लेकिन पारदर्शी निगरानी न होने के कारण यह एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय रिस्क बन गया है। IAEA का कहना है कि सैन्य हमलों में क्षतिग्रस्त हुई साइट्स पर निगरानी रखना अब बेहद मुश्किल हो गया है।
भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा क्रूड ऑयल के रूप में आयात करता है। मिडिल ईस्ट में किसी भी प्रकार का तनाव सीधे तौर पर वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव लाता है। विशेष रूप से 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) से गुजरने वाली शिपिंग रूट्स पर किसी भी संकट का असर भारतीय कंपनियों के इनपुट कॉस्ट पर पड़ेगा। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या यह तनाव आगे चलकर सप्लाई चेन में बाधा पैदा करता है।
क्या है अड़चन?
इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा। UN Security Council में रूस और चीन जैसे परमानेंट मेंबर्स तेहरान पर सख्त प्रतिबंधों के खिलाफ रहे हैं। ऐसे में तत्काल कोई कड़ा निर्णय होने के बजाय लंबे समय तक डिप्लोमेटिक अनिश्चितता बने रहने के आसार हैं। निवेशकों के लिए सलाह है कि कमोडिटी मार्केट और IAEA की अगली बैठकों के अपडेट पर नजर रखें, क्योंकि यही ग्लोबल मार्केट सेंटीमेंट तय करेंगे।
