ईरान सरकार के भीतर हिजाब कानून को लेकर मतभेद गहराते जा रहे हैं। युद्ध और भयंकर आर्थिक तंगी के बीच सत्ता का यह आंतरिक घर्षण ग्लोबल मार्केट के निवेशकों के लिए चिंता का सबब बन गया है, जिससे एनर्जी सप्लाई और महंगाई पर असर पड़ सकता है।
ईरान में हिजाब को लेकर चल रही सख्त नीतियों के बीच सत्ता के गलियारों में दो फाड़ हो गई है। एक ओर कट्टरपंथी गुट पूरी सख्ती के साथ नियमों को लागू करना चाहते हैं, तो दूसरी ओर वरिष्ठ अधिकारियों और व्यावहारिकता में विश्वास रखने वाले लोग किसी भी तरह के घरेलू विद्रोह से बचने के लिए ढील देने की वकालत कर रहे हैं।\n\n### सर्वाइवल की स्ट्रैटेजी\nयह नीतिगत अस्पष्टता सड़कों पर साफ देखी जा सकती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुरक्षा अधिकारियों का वर्तमान में संयम बरतना किसी वैचारिक बदलाव का नहीं, बल्कि सरकार बचाने की एक 'सर्वाइवल स्ट्रैटेजी' है। सरकार को डर है कि 2022 जैसे व्यापक विरोध प्रदर्शन, मौजूदा युद्ध और हाइपर-इन्फ्लेशन के साथ मिलकर सत्ता की नींव हिला सकते हैं।\n\n### ग्लोबल मार्केट पर असर\nनिवेशकों और ग्लोबल मार्केट के लिए यह स्थिति काफी महत्वपूर्ण है। ईरान की मिडिल ईस्ट में केंद्रीय भूमिका और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण एनर्जी शिपिंग रास्तों के करीब होने के कारण, वहां की अस्थिरता कमोडिटी मार्केट में हलचल पैदा कर सकती है। जियोपोलिटिकल अनिश्चितता का सीधा असर एनर्जी प्राइस पर पड़ता है, जो पूरी दुनिया में कॉर्पोरेट खर्च और महंगाई दर को प्रभावित करने की ताकत रखता है।\n\n### इकोनॉमिक रिस्क फैक्टर्स\nईरान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, मुद्रा के अवमूल्यन (Currency Devaluation) और ऊर्जा की कमी से जूझ रहा है। किसी भी तरह का नागरिक असंतोष या सत्ता में बड़ा फेरबदल इस जोखिम को और बढ़ा सकता है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि ईरानी नेतृत्व इन आंतरिक दरारों को कैसे संभालता है, क्योंकि यही ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन और क्षेत्रीय स्थिरता का भविष्य तय करेगा।
