81वीं UN जनरल असेंबली के दौरान विदेश मंत्री S. Jaishankar ने स्पष्ट किया है कि BRICS का लक्ष्य ग्लोबल संस्थाओं को रिप्लेस करना नहीं, बल्कि उनमें सुधार लाना है। यह रुख भारत की संतुलित कूटनीति को दर्शाता है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता को कम करने में मदद करता है।
सुधार के लिए दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में BRICS
विदेश मंत्री ने साफ तौर पर उन अटकलों को खारिज किया है कि BRICS का गठन संयुक्त राष्ट्र (UN) को चुनौती देने या उसे रिप्लेस करने के लिए किया गया है। न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे एक 'गलत विकल्प' करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि BRICS का काम मौजूदा अंतरराष्ट्रीय सिस्टम के भीतर लंबे समय से लंबित सुधारों को गति देना है। उन्होंने माना कि भले ही UN में कुछ खामियां हैं, लेकिन यह एक अनिवार्य ढांचा है। BRICS के माध्यम से गैर-पश्चिमी राष्ट्र अपनी बात रख रहे हैं, जिससे ग्लोबल संस्थाओं की प्रासंगिकता बनी रहे।
ग्लोबल पावर डायनेमिक्स में बदलाव
BRICS में सदस्य देशों की संख्या का दोगुना होना इस बात का प्रमाण है कि दुनिया अब एक अधिक प्रतिनिधित्व वाले वैश्विक ढांचे की मांग कर रही है। जैसे-जैसे 'ग्लोबल साउथ' (Global South) का आर्थिक और राजनीतिक वजन बढ़ रहा है, देश ऐसे मंचों की तलाश कर रहे हैं जो स्थिरता और नवाचार जैसी उनकी प्राथमिकताओं पर काम करें। यह बहुध्रुवीय (multipolar) विश्व की ओर एक बड़ा कदम है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
निवेशकों और बाजार के जानकारों के लिए यह भू-राजनीतिक (geopolitical) मूवमेंट व्यापारिक स्थिरता के लिहाज से काफी अहम है। भारत की 'मल्टी-अलाइंड' कूटनीति उसे अलग-अलग आर्थिक प्रणालियों के बीच एक सेतु (bridge) बनाती है। यह दृष्टिकोण वैश्विक अर्थव्यवस्था के विखंडन के जोखिम को कम करता है और अंतरराष्ट्रीय पूंजी तक पहुंच सुरक्षित रखने में मदद करता है। आगे चलकर, अंतरराष्ट्रीय लेंडिंग प्रैक्टिस और ट्रेड एग्रीमेंट्स में होने वाले सुधार घरेलू उद्योग के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं।
