WTO का फैसला और चीन का आरोप
WTO के पैनल के गठन से भारत की 'मेक इन इंडिया' पहल, खासकर EV और ऑटोमोटिव सेक्टर में, एक नाजुक मोड़ पर आ गई है। चीन का आरोप है कि भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी स्कीमें, जिनमें एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी स्टोरेज, ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स और इलेक्ट्रिक पैसेंजर कार स्कीम शामिल हैं, WTO के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं। बीजिंग का कहना है कि ये स्कीमें स्थानीय उत्पादन को प्राथमिकता देती हैं और विदेशी सामानों व सेवाओं के साथ भेदभाव करती हैं, जिससे यह एक 'प्रोहिबिटेड इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन सब्सिडी' (prohibited import substitution subsidy) बन जाती है। यह चीन का इस मामले में दूसरा प्रयास था, क्योंकि पहली बार भारत ने इसे जनवरी में सफलतापूर्वक ब्लॉक कर दिया था।
भारत का पक्ष और अमेरिका का साथ
WTO की डिस्प्यूट सेटलमेंट बॉडी (DSB) की मीटिंग में भारत ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चीन के साथ हुई बातचीत से यह स्पष्ट हुआ है कि ये उपाय WTO की बाध्यताओं का पूरी तरह पालन करते हैं। भारत ने यह भी कहा कि इन स्कीम्स का चीन के व्यापार हितों पर नगण्य प्रभाव पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में अमेरिका ने भारत का खुलकर समर्थन किया है। अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा कि चीन की यह शिकायत दरअसल, वैश्विक सप्लाई चेन को बिगाड़ने वाली अपनी खुद की गैर-बाजार नीतियों (non-market policies) और ओवरकैपेसिटी (overcapacity) के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती दिलचस्पी
इस विवाद में सिर्फ भारत और चीन ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्रमुख देश भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यूरोपीय संघ (EU), जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी थर्ड-पार्टी राइट्स (third-party rights) रिजर्व किए हैं, जो इस मामले के वैश्विक महत्व को दर्शाता है।
'मेक इन इंडिया' और EV सेक्टर पर असर
भारत की ये इंसेंटिव स्कीमें, जैसे कि PLI फॉर ACC बैटरी स्टोरेज और EV पैसेंजर कार स्कीम, देश को आत्मनिर्भर बनाने, इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने, नई नौकरियां पैदा करने और एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। हालांकि, WTO में इस चुनौती से इन महत्वाकांक्षी योजनाओं पर अनिश्चितता के बादल मंडरा सकते हैं, जिसका असर विदेशी निवेश (foreign investment) और निर्यात रणनीतियों पर पड़ सकता है।
WTO की अपीलेट बॉडी का संकट
इस पूरे विवाद को हल करने में एक बहुत बड़ी बाधा WTO की अपीलेट बॉडी (Appellate Body) का लंबे समय से बंद होना है। 2019 से, अमेरिका द्वारा जजों की नियुक्ति को ब्लॉक करने के कारण यह शीर्ष अपीलीय अदालत काम नहीं कर रही है। इसके बिना, पैनल के फैसले अंतिम तो हो जाते हैं, लेकिन यदि कोई पक्ष अपील करता है, तो मामला अनिश्चित काल के लिए अटक सकता है। यह स्थिति WTO के विवाद निपटान तंत्र (dispute settlement system) को कमजोर करती है और व्यापारिक टकरावों के समाधान को मुश्किल बनाती है, जिससे संरक्षणवाद (protectionism) और व्यापार विखंडन (trade fragmentation) का खतरा बढ़ जाता है।
भू-राजनीतिक अंडरकरंट्स और भविष्य की राह
यह WTO विवाद केवल एक तकनीकी व्यापारिक मसला नहीं है, बल्कि यह चीन और भारत के बीच बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी प्रतीक है। चीन, अपनी विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और राज्य-समर्थित नीतियों के बल पर, दूसरे देशों की औद्योगिक नीतियों को चुनौती दे रहा है। वहीं, भारत अपनी स्वदेशी क्षमता को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे अभी भी विदेशी निवेश और टेक्नोलॉजी पर काफी निर्भर रहना पड़ता है, जो उसे ऐसे व्यापारिक विवादों के प्रति संवेदनशील बनाता है। अमेरिका का भारत को समर्थन, चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को संतुलित करने की एक चाल के तौर पर भी देखा जा सकता है।