भारत ने अपनी पुरानी 'Nuclear Weapons Enabled Terrorism' पॉलिसी को अलविदा कह दिया है। अब देश सरहद पार की धमकियों पर 'प्रोएक्टिव रिस्पॉन्स' की रणनीति अपना रहा है। निवेशकों के नजरिए से यह बदलाव जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता को कम करने वाला है, जो इकोनॉमी के लिए एक बड़ा पॉजिटिव संकेत है।
भारत ने आधिकारिक तौर पर उस पुरानी स्ट्रैटेजिक फ्रेमवर्क से दूरी बना ली है, जो न्यूक्लियर एस्केलेशन के डर से मिलिट्री रिस्पॉन्स को सीमित रखता था। दशकों तक भारत ने 'रेस्टोरेंट' यानी संयम की नीति अपनाई, क्योंकि माना जाता था कि पड़ोसी मुल्कों की हरकतों पर न्यूक्लियर कवच है। लेकिन अब डिफेंस पॉलिसी में बड़ा बदलाव आया है, जहां मिलिट्री एक्शन न्यूक्लियर धमकी के कारण नहीं रुकता।
2016 के बाद आया बड़ा बदलाव
यह बदलाव 2016 की 'सर्जिकल स्ट्राइक' के बाद से स्पष्ट रूप से दिखने लगा था। पुराना मॉडल, जिसे 'न्यूक्लियर वेपन्स इनेबल्ड टेररिज्म' कहा जाता था, अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है। सरकार का रुख साफ है कि भविष्य में किसी भी उकसावे का जवाब टारगेटेड मिलिट्री रिस्पॉन्स से दिया जाएगा, भले ही सामने वाले के पास परमाणु हथियार क्यों न हों।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
इंडियन शेयर मार्केट के लिए यह स्ट्रैटेजिक पिवट काफी मायने रखता है। डोमेस्टिक और विदेशी निवेशकों के लिए जियोपॉलिटिकल रिस्क एक बड़ी चिंता होती है। जब देश की सिक्योरिटी पॉलिसी साफ और निर्णायक होती है, तो यह इकोनॉमी के लिए स्टेबिलिटी लाती है। प्रोएक्टिव डिटेरेंस (Proactive Deterrence) होने से ट्रेड और इंडस्ट्रियल ऑपरेशन्स पर संकट के बादल कम होते हैं। मार्केट आमतौर पर जियोपॉलिटिकल प्रेडिक्टेबिलिटी को पसंद करता है, क्योंकि इससे अचानक आने वाले झटकों (Security Shocks) की आशंका घट जाती है, जिससे बाजार में अनचाही वोलेटिलिटी कम होती है।
