बातचीत पर ब्रेक: क्या है भारत की रणनीति?
नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते (interim bilateral trade agreement) को अंतिम रूप देने के लिए तय की गई बातचीत को स्थगित कर दिया गया है। सरकारी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, यह देरी केवल एक रूटीन प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य 'नवीनतम घटनाओं का मूल्यांकन' करना है। इस ठहराव से भारत को अमेरिका की बदली हुई व्यापार नीति के बीच से अधिक अनुकूल शर्तों पर बातचीत करने का मौका मिल सकता है।
टैरिफ का बदलता माहौल: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी, 2026 को एक अहम फैसले में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए कई तरह के टैरिफ को रद्द कर दिया था। इस फैसले ने अमेरिका की व्यापार नीति की नींव हिला दी। इसके जवाब में, अमेरिकी प्रशासन ने 24 फरवरी, 2026 से विभिन्न कानूनी प्रावधानों के तहत 10% से बढ़ाकर 15% का एक अस्थायी ग्लोबल इंपोर्ट सरचार्ज (global import surcharge) लागू किया।
इस नए, एकसमान टैरिफ ढांचे के कारण, भारत और अमेरिका के बीच पहले तय हुआ 18% का पारस्परिक टैरिफ दर अब उतना प्रभावी नहीं रहा। इससे भारत द्वारा दी जाने वाली रियायतों का महत्व कम हो गया है, और अब भारत को बातचीत में ज्यादा फायदा मिल सकता है। पहले जिन भारतीय सामानों पर 18% का टैरिफ लगना था, अब उन पर आम तौर पर 10% या 15% का ही शुल्क लगेगा।
सेक्टर-स्पेशल टैरिफ: कुछ पर अभी भी भारी मार
हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस व्यापक टैरिफ पुनर्मूल्यांकन के बावजूद, कुछ खास रणनीतिक क्षेत्रों में भारत पर अभी भी भारी अमेरिकी शुल्क (duties) लगे हुए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सेक्शन 232 प्रावधानों के तहत स्टील, एल्यूमीनियम और तांबे पर 50% का भारी टैरिफ बरकरार है। ये दरें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रभावित नहीं हुई हैं, जिससे इन धातुओं के निर्यात पर भारी असर पड़ रहा है। इसी तरह, ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर भी टैरिफ जारी है।
चिंताएं: संप्रभुता, अनिश्चितता और कम फायदे का डर
चिंताएं इस बात को लेकर बढ़ रही हैं कि यह व्यापार ढांचा, भले ही सार्वजनिक रूप से प्रगति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हो, इसमें कई जोखिम भी हैं। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) पर अमेरिकी दखल, खासकर रूसी तेल खरीद पर, आलोचना का विषय बना हुआ है। इसके अलावा, अमेरिकी टैरिफ नीति में अचानक आए बदलावों से व्यवसायों के लिए अनिश्चितता बनी हुई है। भारत की रियायतों का घटता मूल्य यह सवाल उठाता है कि क्या आर्थिक लाभ किए गए संभावित समझौतों के लायक हैं।