विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते मतभेदों पर चिंता जताई है। पाकिस्तान के साथ अमेरिका के बढ़ते तालमेल और ट्रेड पॉलिसी में टकराव के कारण निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बन सकता है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी को संबोधित करते हुए भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक साझेदारी में आ रही चुनौतियों को खुलकर रखा है। उनका कहना है कि सुरक्षा चिंताओं और नीतियों के तालमेल में आ रहे अंतर के कारण दोनों देशों के रिश्तों में कुछ बाधाएं पैदा हो गई हैं।
सुरक्षा और कूटनीतिक तनाव
मंत्री ने मुख्य रूप से सीमा पार आतंकवाद को एक बड़ी समस्या बताया है। भारत के लिए पाकिस्तान के साथ अमेरिका का बढ़ता जुड़ाव एक चिंता का विषय है, खासकर डोनाल्ड ट्रम्प और पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के बीच हालिया बातचीत को लेकर। दिल्ली का मानना है कि ऐसी सक्रियता भारत के आतंकवाद विरोधी प्रयासों को कमजोर करती है। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि इन सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना साझेदारी की मजबूती के लिए सही नहीं है।
ट्रेड और एनर्जी स्ट्रेटेजी
सुरक्षा के अलावा, ट्रेड पॉलिसी और टैरिफ स्ट्रक्चर को लेकर भी दोनों देशों के बीच असहमति बनी हुई है। इसके साथ ही, रूसी तेल के आयात पर भारत का स्टैंड भी अमेरिका के साथ तनाव का एक बिंदु है। हालांकि, भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन बुनियादी विवादों का समाधान जरूरी है।
मार्केट और निवेशकों पर असर
भले ही ये मामले डिप्लोमैटिक हैं, लेकिन इनका असर स्टॉक मार्केट सेंटीमेंट पर पड़ना तय है। FIIs (फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) अक्सर ऐसी भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखकर ही निवेश का फैसला लेते हैं। अमेरिका पर निर्भर रहने वाले सेक्टर जैसे IT सर्विसेज, फार्मा और टेक्सटाइल पर इन ट्रेड नीतियों का सीधा असर पड़ सकता है। एनर्जी सेक्टर के लिए भी यह 'स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संतुलित करने की एक बड़ी चुनौती है। निवेशकों को आगामी ट्रेड वार्ताओं और कूटनीतिक बैठकों पर नजर रखने की सलाह दी जा रही है।
