भारत ने यूनाइटेड नेशंस (UN) से 'डुअल-यूज़' टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर पर कड़ी निगरानी रखने की मांग की है। इस कदम से भारत के डिफेंस और हाई-टेक कंपनियों के लिए रेगुलेटरी माहौल बदल सकता है, जिससे स्वदेशी तकनीक पर जोर देने वाली कंपनियों को बड़ा फायदा मिल सकता है।
भारत ने यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) की पहली समिति में औपचारिक रूप से मांग की है कि संवेदनशील 'डुअल-यूज़' तकनीकों के ट्रांसफर पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण सख्त किए जाएं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उच्च-स्तरीय कंपोनेंट्स और तकनीकी विशेषज्ञता गलत हाथों या उन देशों तक न पहुंचे, जिनका रिकॉर्ड परमाणु और रासायनिक हथियारों के प्रसार का रहा है।
इंडस्ट्री के लिए 'डुअल-यूज़' का मतलब
'डुअल-यूज़' टेक्नोलॉजी का मतलब ऐसी तकनीक या मैटेरियल से है, जिसका इस्तेमाल नागरिक (civilian) और सैन्य (military) दोनों कामों के लिए किया जा सकता है। इसमें हाई-परफॉर्मेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, स्पेशलाइज्ड केमिकल्स और सैटेलाइट-ग्रेड मैटेरियल्स शामिल हैं। फिलहाल ग्लोबल सप्लाई चेन में मौजूद कमियों के कारण इनका दुरुपयोग हथियारों के विकास में हो रहा है, जिसे रोकने के लिए भारत ने एक समान और स्पष्ट ग्लोबल फ्रेमवर्क की वकालत की है।
डिफेंस और टेक सेक्टर पर असर
निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि ग्लोबल स्तर पर सप्लाई चेन में पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है। जो कंपनियां विदेशी तकनीक पर पूरी तरह निर्भर हैं, उन्हें कड़े नियमों और अनुपालन (compliance) में देरी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत अपनी खुद की तकनीक विकसित करने वाली स्वदेशी कंपनियों के लिए यह एक बड़ा एडवांटेज साबित हो सकता है।
रेगुलेटरी बदलाव और रिस्क
भारत 2002 से ही इन मानकों को सख्त बनाने की वकालत कर रहा है। जैसे-जैसे दुनिया 'प्रोटेक्शनिज्म' की ओर बढ़ रही है, जिन कंपनियों का सप्लाई चेन पारदर्शी है, उनमें निवेश का रिस्क कम होगा। हालांकि, सख्त नियमों से अनुपालन लागत (compliance cost) बढ़ सकती है, जो शॉर्ट टर्म में प्रॉफिट मार्जिन पर असर डाल सकती है। निवेशकों को अब रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence) की नई प्रोक्योरमेंट नीतियों और ग्लोबल बॉडीज के फैसलों पर नजर बनाए रखने की जरूरत है।
