भारत सरकार ने Indus Waters Treaty पर वर्ल्ड बैंक द्वारा गठित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को औपचारिक रूप से ठुकरा दिया है। नई दिल्ली का स्पष्ट मानना है कि ट्रिब्यूनल के पास कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और घरेलू हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स बिना किसी रुकावट के जारी रहेंगे।
फैसले का आधार क्या है?
31 अगस्त, 2026 को नई दिल्ली ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट कर दिया कि यह आर्बिट्रल बॉडी ट्रीटी की शर्तों का उल्लंघन करके बनाई गई है, इसलिए इसका कोई कानूनी आधार नहीं है। भारत ने शुरू से ही इस ट्रिब्यूनल के सामने पेश होने से इनकार किया है, क्योंकि सरकार का मानना है कि किसी भी संप्रभु फैसले (Sovereign decisions) पर फैसला सुनाने का अधिकार इस कोर्ट को नहीं है।
इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर असर
भारत सरकार के इस रुख से उन निवेशकों और मार्केट ऑब्जर्वर्स को बड़ी राहत मिली है जो इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को ट्रैक कर रहे हैं। नई दिल्ली ने साफ किया है कि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) पर चल रहे रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स का काम जारी रहेगा।
अप्रैल 2025 में पहलगाम की घटना के बाद से ही सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) एक तरह से ठंडे बस्ते में है। सरकार की इस रणनीति का सीधा मतलब है कि वह अपनी रणनीतिक संपत्तियों को अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप से बचाने के लिए पूरी तरह तैयार है। फिलहाल, किसी कंपनी के शेयर पर इसका सीधा असर नहीं है, लेकिन डोमेस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार पर बाजार की नजरें बनी रहेंगी।
