भारत ने Indus Waters Treaty को लेकर पाकिस्तान की UN अपील को औपचारिक रूप से चुनौती दी है। भारत का कहना है कि Permanent Court of Arbitration का फैसला गैर-कानूनी है, जिसका सीधा असर जम्मू-कश्मीर में चल रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर पड़ सकता है।
भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि Permanent Court of Arbitration (CoA) के पास Indus Waters Treaty के मामलों में फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है। विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि कोर्ट का हालिया अवार्ड एक अवैध बॉडी का परिणाम है। यह कानूनी और कूटनीतिक गतिरोध लंबे समय से इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है।
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर नजर
विवाद की असली वजह जम्मू-कश्मीर में भारत के जारी और प्रस्तावित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स हैं। ये प्रोजेक्ट्स भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान इन प्रोजेक्ट्स की डिजाइन और तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठा रहा है, जबकि भारत का कहना है कि ये सभी काम ट्रीटी के प्रावधानों के पूरी तरह मुताबिक हैं।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
निवेशकों के नजरिए से देखें तो यह विवाद बॉर्डर क्षेत्रों में चल रहे एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए रेगुलेटरी और एग्जीक्यूशन रिस्क पैदा करता है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता या कूटनीतिक तनाव बढ़ने से प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग, एनवायरमेंटल अप्रूवल और टाइमलाइन में देरी हो सकती है। जो कंपनियां इन क्षेत्रों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं, उन्हें अब क्षेत्रीय स्थिरता और कानूनी पेचीदगियों के बीच तालमेल बिठाना होगा।
फिलहाल मार्केट एक्सपर्ट्स और स्टेकहोल्डर्स सरकार की ओर से आने वाले बयानों पर नजर रखे हुए हैं। प्रोजेक्ट कमीशनिंग की टाइमलाइन और कूटनीतिक घटनाक्रम सीधे तौर पर उन कंपनियों के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं जो इन संवेदनशील क्षेत्रों में एनर्जी डेवलपमेंट का काम कर रही हैं।
