संयुक्त राष्ट्र में भारत ने Organisation of Islamic Cooperation (OIC) की कड़ी आलोचना की है। भारत ने स्पष्ट कहा कि आतंकवाद के पीड़ित और उसे बढ़ावा देने वालों में अंतर करना जरूरी है। सांसद बिप्लब कुमार देब ने सीमा पार से हो रहे खतरों के खिलाफ भारत के संप्रभु अधिकारों को मजबूती से दोहराया है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति की बैठक में भारत ने OIC के रुख को सिरे से खारिज कर दिया। भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे लोकसभा सांसद बिप्लब कुमार देब ने ओआईसी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह संगठन आतंकवाद के पीड़ितों और इसे प्रायोजित करने वाले राज्य एक्टर्स के बीच फर्क करने में नाकाम रहा है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब OIC ने भारत द्वारा पाकिस्तान और पीओके (POK) में आतंक के बुनियादी ढांचे के खिलाफ की गई कार्रवाई की आलोचना की।
भारत ने बैठक में साफ शब्दों में कहा कि अपने नागरिकों और क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा पार से आ रहे खतरों का जवाब देना भारत का संप्रभु अधिकार है। सरकार ने रेखांकित किया कि ये आतंकी नेटवर्क अक्सर राज्य प्रायोजित समर्थन प्राप्त करते हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा हैं। भारत ने 2025 के पहलगाम आतंकी हमले का विशेष उल्लेख करते हुए इसे मानवीय त्रासदी बताया और आतंक को जायज ठहराने वाली किसी भी कोशिश को ठुकरा दिया।
इस मौके का इस्तेमाल करते हुए भारत ने वैश्विक कानूनी ढांचे की जरूरत पर जोर दिया। भारत 1996 से ही 'कॉम्प्रिहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म' (CCIT) को लागू करने की वकालत कर रहा है। भारत का मानना है कि आज के दौर के आधुनिक आतंकवाद, जिसमें नई तकनीक और प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल हो रहा है, उसे रोकने के लिए पुराने कानून नाकाफी हैं।
हालांकि इस घटना का सीधा असर शेयर बाजार पर नहीं पड़ता, लेकिन लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स के लिए भू-राजनीतिक स्थिरता (Geopolitical stability) एक महत्वपूर्ण पहलू है। आर्थिक विकास के लिए सुरक्षा का माहौल अनिवार्य है। निवेशक अब यह देख रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के प्रस्तावित प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर भारत का कड़ा रुख आगे क्या मोड़ लेता है।
