रेड सी (Red Sea) और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में लगातार बढ़ते तनाव के बीच भारत ने ग्लोबल ट्रेड और नाविकों की सुरक्षा के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की है। इस अस्थिरता का सीधा असर शिपिंग फ्रेट रेट्स और इंश्योरेंस प्रीमियम पर पड़ रहा है, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स और इंपोर्टर्स की चिंताएं बढ़ गई हैं।
समुद्री मार्गों पर मंडराता खतरा
भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए मिडिल ईस्ट के समुद्री रास्तों को सुरक्षित करने की जोरदार अपील की है। बाब अल-मंदेब स्ट्रेट और दक्षिणी रेड सी में जारी असुरक्षा के कारण मर्चेंट वेसल्स (व्यापारी जहाज) पर लगातार खतरा बना हुआ है, जो वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कारोबार पर क्या पड़ेगा असर?
जब जहाजों को सुरक्षा कारणों से अपना रूट बदलना पड़ता है—जैसे केप ऑफ गुड होप के जरिए लंबा चक्कर काटना—तो इससे न केवल यात्रा का समय बढ़ता है, बल्कि फ्यूल की खपत और ऑपरेशनल लागत में भी भारी इजाफा होता है। कंपनियों के लिए इसके परिणामस्वरूप शिपिंग फ्रेट रेट्स और इंश्योरेंस प्रीमियम में बढ़ोतरी होना लगभग तय है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहल
भारत ने इस संकट से निपटने के लिए लाइबेरिया के साथ मिलकर 'Group of Friends on Safety and Security of Shipping and Seafarers' का गठन किया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी आपात स्थिति में मेडिकल सहायता या इवैक्यूएशन (निकासी) को बेहतर बनाना है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
मार्केट एक्सपर्ट्स के अनुसार, जो सेक्टर पूरी तरह से मैरीटाइम लॉजिस्टिक्स पर निर्भर हैं, जैसे मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और कमोडिटी ट्रेडिंग, उन पर सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिल सकता है। निवेशकों की नजर अब शिपिंग इंश्योरेंस इंडेक्स और फ्रेट कॉस्ट पर टिकी है। यदि यह भू-राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो सप्लाई चेन की लागत का बढ़ा हुआ असर आने वाले महीनों में कंपनियों के मार्जिन पर साफ दिख सकता है।
