UN Security Council Reform: भारत की दो टूक, बिना वीटो पावर के विस्तार स्वीकार नहीं

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AuthorMehul Desai|Published at:
UN Security Council Reform: भारत की दो टूक, बिना वीटो पावर के विस्तार स्वीकार नहीं

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों पर भारत ने अपना स्टैंड साफ कर दिया है। भारत ने उन प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें नए स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार देने से इनकार किया गया है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा परिषद का विस्तार केवल प्रतीकात्मक नहीं हो सकता। राजदूत हरीश पर्वथननी ने चेतावनी दी है कि यदि नए स्थायी सदस्यों को 5 मौजूदा महाशक्तियों (P5) के समान वीटो का अधिकार नहीं मिलता है, तो यह केवल पुरानी शक्ति संरचना को बरकरार रखेगा।\n\n### पुरानी व्यवस्था बनाम आधुनिक वास्तविकता\n\nनई दिल्ली का मानना है कि 1945 के ढांचे पर आधारित सुरक्षा परिषद आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और शक्ति संतुलन से पूरी तरह कटा हुआ है। बिना समान अधिकारों के किसी भी सुधार को भारत एक 'हायरार्की' बनाने की कोशिश मानता है। यह भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत देश वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया और ट्रेड स्टेबिलिटी में अपनी भूमिका को मजबूत करना चाहता है।\n\n### चुनाव पर नजर\n\nस्थायी सदस्यता के दावों के साथ-साथ भारत अपनी तात्कालिक कूटनीति पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। देश 2028-29 के सत्र के लिए गैर-स्थायी सदस्य के रूप में अपनी दावेदारी पेश करने की तैयारी कर रहा है। जून में होने वाले चुनाव में भारत का मुकाबला ताजिकिस्तान से होगा।\n\nनिवेशकों और बाजार विशेषज्ञों के लिए, ये कूटनीतिक घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण हैं। अंतरराष्ट्रीय निकायों में भारत का प्रभाव बढ़ने से देश का रिस्क प्रोफाइल बेहतर होता है और वैश्विक व्यापारिक साझेदारियों में भारत की आवाज मजबूत होती है, जो अंततः लंबे समय में देश की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है।

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