नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बाद भारत और चीन के बीच संबंधों में सुधार की उम्मीदें जगी हैं। दोनों देशों ने ट्रेड असंतुलन और सप्लाई चेन जैसी चुनौतियों को सुलझाने पर जोर दिया है, जिससे निवेशकों की नजर अब भविष्य के आर्थिक फैसलों पर टिकी है।
नई दिल्ली में 12 सितंबर, 2026 को 18वें BRICS समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति और बाजार में हलचल पैदा कर दी है। सात सालों में चीनी राष्ट्रपति की यह पहली भारत यात्रा है, जिसे दोनों देशों के बीच संबंधों के 'रीसेट' (Reset) के रूप में देखा जा रहा है।
आर्थिक स्थिरता पर फोकस
दोनों नेताओं की बातचीत का मुख्य केंद्र आर्थिक स्थिरता रहा। दोनों पक्षों ने माना कि स्ट्रक्चरल ट्रेड असंतुलन और मार्केट एक्सेस जैसी समस्याओं को दूर करना जरूरी है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में ट्रेड फ्रिक्शन के कारण व्यापार करना कठिन हो गया था। अब उम्मीद है कि आने वाले समय में क्रॉस-बॉर्डर कॉमर्स के लिए एक अधिक स्थिर और अनुमानित वातावरण बनेगा।
प्रमुख चुनौतियां और फैक्ट्स
हालांकि, डिप्लोमेटिक रिश्तों में सुधार का दौर शुरू हुआ है, लेकिन राह अभी भी आसान नहीं है। इसके पीछे कुछ ठोस कारण हैं:
- ट्रेड डेफिसिट: भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा $100 बिलियन के आंकड़े को पार कर चुका है, जो एक बड़ी आर्थिक चुनौती है।
- FDI और वीजा: चीनी कंपनियों के लिए भारत में FDI निवेश पर लगी पाबंदियां और वीजा से जुड़ी मुश्किलें अभी भी एक बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
- बॉर्डर विवाद: निवेशकों के लिए 'लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल' (LAC) पर शांति सबसे महत्वपूर्ण मॉनिटरेबल है। भारत ने स्पष्ट किया है कि सीमा पर शांति ही सामान्य संबंधों की पहली शर्त है।
अब देखना यह होगा कि यह कूटनीतिक पहल कितनी जल्दी ट्रेड पॉलिसी और सप्लाई चेन नॉर्मलाइजेशन में तब्दील होती है। बाजार के एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि इस चर्चा से FDI अप्रूवल में तेजी आती है, तो यह कई सेक्टर्स के लिए बड़ी राहत हो सकती है।
