UNSC Reform: 1945 का ढांचा हुआ पुराना, भारत ने ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर को दी चुनौती

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AuthorAditya Rao|Published at:
UNSC Reform: 1945 का ढांचा हुआ पुराना, भारत ने ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर को दी चुनौती

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में बड़े बदलावों की मांग की है। राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने इसे 1945 के पुराने दौर का ढांचा बताया है। निवेशकों के लिए यह खबर भारत की बढ़ती ग्लोबल आर्थिक और कूटनीतिक धाक का संकेत है, जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड नीतियों को प्रभावित कर सकती है।

भारत अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के लिए अपनी मुहिम को और तेज कर रहा है। नई दिल्ली का स्पष्ट मानना है कि मौजूदा परिषद का ढांचा आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं से पूरी तरह कट चुका है। हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र महासभा में राजदूत पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि 1945 के विजेताओं द्वारा बनाया गया सिस्टम अब केवल 'रियर व्यू मिरर' की तरह काम कर रहा है।

बातचीत में 15 साल का गतिरोध

मुद्दे की जड़ 'इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशंस' (IGN) प्रक्रिया है, जो पिछले 15 साल से ठप पड़ी है। भारत ने इसमें किसी भी तरह के औपचारिक ड्राफ्ट या तय समय-सीमा के न होने की कड़ी आलोचना की है। भारत का मानना है कि यह केवल यथास्थिति (status quo) बनाए रखने की रणनीति है, न कि समावेशी गवर्नेंस का रास्ता।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह उन उभरती हुई आर्थिक शक्तियों को प्रतिनिधित्व दिलाने की लड़ाई है, जो आज दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। उदाहरण के लिए, एशिया-प्रशांत क्षेत्र दुनिया की 60% से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के मामले में इसे नजरअंदाज किया गया है। भारत अपनी ग्लोबल सप्लाई चेन और ट्रेड में भूमिका को मजबूत करना चाहता है, जिसके लिए UNSC में जगह मिलना महत्वपूर्ण है।

निवेश और जोखिम का एंगल

निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि UNSC सुधार एक जटिल और लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया है, जिसमें 'P5' देशों के पास वीटो पावर है। भारत ने इसे लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है कि यदि वीटो पावर बरकरार रहती है, तो इसे सभी स्थायी सदस्यों को दिया जाना चाहिए ताकि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को 'सेकंड-टियर' न समझा जाए। बाजार के लिए मुख्य निगरानी यह होगी कि क्या UN में किसी औपचारिक बातचीत के दस्तावेज पर सहमति बनती है या नहीं, क्योंकि यह भारत की वैश्विक नीतिगत महत्वाकांक्षाओं का एक बड़ा पैमाना साबित होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.