भारत अब लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों (CELAC) के साथ अपने व्यापार को **$50 बिलियन** के पार ले जाने की तैयारी में है। इस रणनीति का मुख्य फोकस EV सेक्टर के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स और फार्मा एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है।
भारत सरकार अब CELAC देशों के साथ एक मजबूत इकोनॉमिक फ्रेमवर्क तैयार करने में जुट गई है। फिलहाल दोनों क्षेत्रों के बीच सालाना व्यापार $50 बिलियन से अधिक है। सरकार की कोशिश है कि चिली और पेरू जैसे देशों के साथ नए ट्रेड एग्रीमेंट और MERCOSUR ब्लॉक के साथ मौजूदा समझौते को विस्तार देकर भारतीय कंपनियों के लिए मार्केट एक्सेस को आसान बनाया जाए और जरूरी कच्चा माल सुरक्षित किया जाए।
फार्मा और ग्रीन एनर्जी में बड़े मौके
निवेशकों के लिए फार्मा और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में सबसे बड़ा एक्शन देखने को मिल सकता है। लैटिन अमेरिकी देश भारतीय जेनेरिक दवाओं के लिए बहुत बड़ा मार्केट रहे हैं। अगर नए ट्रेड एग्रीमेंट के तहत टैरिफ बैरियर्स कम होते हैं, तो भारतीय फार्मा कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में बड़ा सुधार हो सकता है।
वहीं, EV इंडस्ट्री के लिए यह डील संजीवनी बन सकती है। चिली लिथियम और कॉपर का बड़ा उत्पादक है। KABIL (Khanij Bidesh India Ltd) जैसी कंपनियां वहां लिथियम एसेट्स तलाश रही हैं। अगर सरकार-स्तर पर ये समझौते सफल होते हैं, तो भारतीय EV बैटरी और ऑटो कंपनियों की विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम होगी।
क्या हैं चुनौतियां?
निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी नजर रखनी होगी। इस क्षेत्र में करेंसी वोलैटिलिटी (मुद्रा में उतार-चढ़ाव) और राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय के निवेश के लिए रिस्की हो सकती है। इसके अलावा, वहां चीनी कंपनियों का दबदबा पहले से ही है, जिससे कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलेगी। साथ ही, भौगोलिक दूरी के कारण लॉजिस्टिक्स और शिपिंग की लागत एक्सपोर्ट की कॉम्पिटिटिवनेस पर असर डाल सकती है।
बाजार की नजर अब चिली के साथ होने वाली 'कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' और पेरू के साथ 'फ्री ट्रेड एग्रीमेंट' की प्रोग्रेस पर टिकी है। इन डील्स की शर्तें ही तय करेंगी कि भारतीय कंपनियां वहां अपने ऑपरेशंस को कितनी तेजी से बढ़ा पाएंगी।
