श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति Gotabaya Rajapaksa ने 2019 के Easter Sunday bombings मामले में अपनी गिरफ्तारी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। अक्टूबर 2026 में कोर्ट ऑफ अपील द्वारा उनकी अपील खारिज किए जाने के बाद यह उनका अगला कानूनी कदम है।
कानूनी लड़ाई और सुरक्षा का मुद्दा
यह पूरा मामला 2019 में हुए चर्च और लग्जरी होटलों पर आत्मघाती हमलों से जुड़ा है। जांच में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि तत्कालीन प्रशासन ने इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बावजूद समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। इस लापरवाही को लेकर सरकारी अधिकारियों पर आपराधिक लापरवाही के गंभीर आरोप हैं, और अब अदालतें इस बात पर मंथन कर रही हैं कि क्या शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
कानूनी शिकंजा और Travel Ban
साल 2022 में बड़े पैमाने पर हुए जनआक्रोश के बाद सत्ता से बाहर हुए Gotabaya Rajapaksa पर जून 2026 से ही ट्रैवल बैन लगा हुआ है। 'Prevention of Terrorism Act' के तहत हो रही यह जांच पूर्व राष्ट्रपति के लिए कानूनी मुश्किलें और बढ़ा रही है। अदालत का हालिया रुख यह दिखाता है कि उनके पास अब कानूनी विकल्प बहुत कम बचे हैं।
क्षेत्रीय और राजनीतिक प्रभाव
दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर नजर रखने वाले निवेशकों और जानकारों के लिए यह घटना श्रीलंका की बदलती राजनीतिक और कानूनी तस्वीर को दिखाती है। देश फिलहाल अपनी आर्थिक और संस्थागत रिकवरी की राह पर है। ऐसे में पूर्व नेतृत्व से जुड़े हाई-प्रोफाइल केस का निपटारा भविष्य की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था के लिए एक मिसाल बन सकता है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई की तारीखों और वहां से आने वाले फैसलों पर टिकी हैं।
