जर्मनी के **34** शहरों में युवाओं ने आर्थिक मंदी और पब्लिक सर्विस फंडिंग की कमी को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया है। फ्रैंकफर्ट समेत कई जगहों पर बिगड़ते हालातों पर ग्लोबल निवेशकों की पैनी नजर है, क्योंकि जर्मनी की इकोनॉमिक सेहत का सीधा असर यूरोपियन मार्केट और ग्लोबल कंपनियों पर पड़ता है।
जर्मनी में इस वीकेंड 'Gen Z regelt' नामक यूथ मूवमेंट के बैनर तले 34 शहरों में बड़े विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। युवा प्रदर्शनकारी शिक्षा और हेल्थकेयर सेक्टर में सरकारी फंडिंग बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, साथ ही वे अनिवार्य सैन्य सेवा (Compulsory Military Service) का भी कड़ा विरोध कर रहे हैं। हालांकि अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन फ्रैंकफर्ट जैसे शहरों में हुई लूटपाट और संपत्ति के नुकसान की घटनाओं ने देश के भीतर बढ़ते सामाजिक और आर्थिक तनाव को उजागर कर दिया है।
क्यों परेशान हैं जर्मनी के युवा?
यूरोप की सबसे बड़ी इकोनॉमी, जर्मनी, इन दिनों सुस्त विकास (Stagnant Growth) और बढ़ती उम्र की आबादी जैसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार की राजकोषीय सख्ती (Fiscal Consolidation) के कारण पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत बदतर हो गई है। छात्रों का साफ कहना है कि यूनिवर्सिटी कैंपस की खस्ताहाल स्थिति अब बर्दाश्त के बाहर है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
जर्मनी ग्लोबल बिजनेस का एक बड़ा हब है और यूरोपियन यूनियन (EU) का मुख्य पार्टनर है। भारत की कई बड़ी टेक्नोलॉजी, ऑटोमोटिव और फार्मा कंपनियां जर्मनी में बड़े स्तर पर काम कर रही हैं। अगर यूरोप की सबसे बड़ी इकोनॉमी में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका असर सीधे तौर पर ग्लोबल मार्केट सेंटीमेंट और यूरो (Euro) करेंसी पर पड़ सकता है, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल नेशनल स्कूल स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन (BSK) ने इन प्रदर्शनों से दूरी बना ली है, लेकिन यह मामला अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर एक बड़ी बहस बन चुका है। मार्केट वॉचर्स की नजर अब इस पर है कि जर्मन सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। क्या सरकार अपनी फिस्कल पॉलिसी में बदलाव करेगी, या फिर आर्थिक सुस्ती के कारण बढ़ता असंतोष लंबे समय तक जारी रहेगा? यह फैसला यूरोपियन इंडस्ट्रियल स्टेबिलिटी और ग्लोबल इक्विटी मार्केट्स के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
