Saxony-Anhalt चुनाव में Alternative for Germany (AfD) को मिली शानदार **43.8%** वोट शेयर के बाद जर्मन संसद में सियासी घमासान छिड़ गया है। चांसलर Friedrich Merz की सरकार के सामने अब बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है, जिससे इकोनॉमिक पॉलिसी और लेजिस्लेटिव काम ठप होने का डर बढ़ गया है।
जर्मन संसद इस सप्ताह एक युद्धक्षेत्र में बदल गई, जब चांसलर Friedrich Merz और AfD की लीडर Alice Weidel के बीच तीखी बहस देखने को मिली। Saxony-Anhalt में AfD ने 43.8% वोट हासिल कर इतिहास रच दिया, जबकि चांसलर की Christian Democratic Union (CDU) सिमटकर महज 17.2% पर आ गई। इस चुनावी बदलाव ने सत्तारूढ़ गठबंधन पर भारी दबाव बना दिया है। AfD अब राज्य संसद की 83 में से 39 सीटों पर कब्जा जमा चुकी है, हालांकि वे बहुमत से अभी भी दूर हैं।
सरकार की चिंता और 'फायरवॉल' की रणनीति
बहस के दौरान, Alice Weidel ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए और इसे नीतिगत बदलाव की जनता की मांग बताया। इसके जवाब में, Friedrich Merz ने AfD के साथ किसी भी तरह के राजनीतिक सहयोग से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने पार्टी के खिलाफ 'पॉलिटिकल फायरवॉल' की नीति दोहराते हुए कहा कि AfD का इकोनॉमिक रिफॉर्म और माइग्रेशन एजेंडा देश के लिए खतरनाक है और इससे विदेशी लेबर पर निर्भर इंडस्ट्रीज को नुकसान हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह बड़ा रिस्क?
इन्वेस्टर्स और बिजनेस कम्युनिटी के लिए यह टकराव चिंता का विषय है। जर्मनी पहले ही इकोनॉमिक स्टैग्नेशन से जूझ रहा है। संसद में बढ़ते टकराव से यह डर पैदा हो गया है कि अहम इकोनॉमिक रिफॉर्म्स, एनर्जी पॉलिसी और फिस्कल मेजर्स पर डेडलॉक (गतिरोध) पैदा हो सकता है। इसके अलावा, फॉरेन पॉलिसी पर भी रशिया और यूक्रेन को लेकर AfD के रुख ने ट्रेड और डिफेंस कमिटमेंट्स को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है।
अब सबकी निगाहें 20 सितंबर को होने वाले बर्लिन और Mecklenburg-Western Pomerania के क्षेत्रीय चुनावों पर टिकी हैं। क्या सरकार महंगाई, एनर्जी कॉस्ट और इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिटिवनेस को सुधारकर जनता का भरोसा वापस जीत पाएगी, यही आने वाले समय में मार्केट और जर्मनी के फ्यूचर के लिए सबसे बड़ा ट्रिगर होगा।
