जलवायु संकट और चुनावी प्रक्रियाएँ
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (International IDEA) ने अपनी एक रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 20 सालों में दुनिया भर के 52 देशों में 94 ऐसे चुनाव हुए हैं, जिन्हें भयानक मौसम की घटनाओं ने गंभीर रूप से प्रभावित किया है। भारत का चुनावी ढांचा भी लगातार इन जलवायु चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भारत में हीटवेव का बढ़ता प्रभाव
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में भारत में लगभग हर दिन कोई न कोई चरम मौसमी घटना दर्ज की गई। साल 2025 (जनवरी से नवंबर) में तो पिछले चार सालों में सबसे ज़्यादा ऐसी घटनाएं हुईं, जो एक बढ़ते संकट की ओर इशारा करती हैं।
खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान, देश के कई हिस्सों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया था। इस भीषण गर्मी का असर जानलेवा भी रहा। अंतिम मतदान दिवस पर एक क्षेत्र में कम से कम 33 मतदान अधिकारियों की गर्मी से मौत की खबर आई थी। इससे पहले 2019 में, ओडिशा के एक निर्वाचन क्षेत्र में अत्यधिक गर्मी के कारण मतदान को टालना पड़ा था। चुनाव आयोग (Election Commission of India) ने मतदाताओं के लिए पानी, छायादार स्थान और मेडिकल किट जैसी सुविधाएं मुहैया कराने की कोशिश की है, साथ ही आपदा प्रबंधन योजनाएं भी बनाई हैं। हालांकि, इन तैयारियों में अभी भी एकरूपता की कमी है।
दुनिया भर में मतदान में देरी के कारण
रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं के कारण 2006 के बाद से कम से कम 26 चुनाव टाले गए हैं। साल 2024 में ही, 18 देशों में 23 ऐसे चुनाव हुए जो तूफानी चक्रवात, बाढ़, हीटवेव, जंगल की आग और ज्वालामुखी फटने जैसी घटनाओं से प्रभावित हुए।
अचानक आने वाली आपदाएं जैसे तूफान और बाढ़, मौसमी बाधाओं का सबसे बड़ा कारण हैं, जो 67% घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। हीटवेव का योगदान 9% है, जबकि भूकंप और जंगल की आग प्रत्येक 7% के लिए जिम्मेदार हैं। यह जोखिम अमीर या गरीब देशों के बीच भेदभाव नहीं करता, जो जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) की एकीकृत रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है।
चुनावों के लिए जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) बनाना
International IDEA का कहना है कि बढ़ते तापमान की दुनिया में चुनावी अखंडता (Electoral Integrity) को बनाए रखने के लिए, विश्वसनीय चुनावों की परिभाषा को शारीरिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु प्रतिरोध (Climate Resilience) को शामिल करने के लिए विस्तृत करने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में चुनाव निकायों और मौसम, पर्यावरण व आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की मांग की गई है ताकि शुरुआती चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके। चुनावी प्रणालियों को राष्ट्रीय जलवायु अनुकूलन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण योजनाओं (Disaster Risk Reduction Plans) में औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए। संस्था के महासचिव केविन कासास-ज़मोरा (Kevin Casas-Zamora) ने कहा है कि ये दूर के खतरे नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने खड़ी तत्काल वास्तविकताएं हैं, जिनका सामना करना ही होगा।
