फ्रांस और स्पेन में बढ़ती राजनीतिक उठापटक के चलते इकोनॉमिक अनिश्चितता का माहौल है। हाई डेट और सोशल अनरेस्ट की वजह से यूरो कमजोर हुआ है और बॉन्ड यील्ड में तेजी दर्ज की गई है, जिसका सीधा असर ग्लोबल मार्केट और निवेशकों की सेंटीमेंट पर दिख रहा है।
यूरोप में राजनीतिक माहौल लगातार अस्थिर होता जा रहा है। फ्रांस में सरकार अपने पब्लिक डेफिसिट (Public Deficit) को कंट्रोल करने के लिए जूझ रही है, जो जीडीपी (GDP) का 5.4% आंका गया है। सरकार ने 2027 तक इसे 5% पर लाने के लिए €54 बिलियन की बजट कटौती का प्लान बनाया है, जिसके विरोध में पब्लिक वर्कर्स सड़कों पर उतर आए हैं। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
मार्केट का रिएक्शन
निवेशकों की घबराहट साफ दिख रही है। फ्रांस के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर लगभग 4.96% हो गए हैं। वहीं, यूरो पर भी दबाव बना हुआ है और यह अक्टूबर की शुरुआत में US डॉलर के मुकाबले 1.116 से 1.12 के बीच ट्रेड कर रहा है।
स्पेन का संकट
स्पेन की स्थिति भी चिंताजनक है। वहां 29 नवंबर 2026 को स्नैप जनरल इलेक्शन (Snap General Election) होने वाले हैं। संसद में हाउसिंग डिक्री फेल होने के बाद वहां का लेजिस्लेटिव प्रोसेस पूरी तरह ठप हो गया है। महंगाई और हाउसिंग की समस्या वहां वोटर्स के बीच असंतोष का मुख्य कारण बनी हुई है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
यूरोप में चल रही यह अनिश्चितता भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए भी चिंता का विषय है। अक्सर ग्लोबल मार्केट में 'रिस्क-ऑफ' (Risk-off) सेंटीमेंट आने पर विदेशी निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में उभरते बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। इसके अलावा, जिन भारतीय कंपनियों का यूरोप में बड़ा एक्सपोर्ट बिजनेस है, उन्हें वहां की कमजोर डिमांड और करेंसी वोलैटिलिटी (Currency Volatility) के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
