यूरोप में जेन-जेड (Gen Z) युवाओं द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन गहरे आर्थिक असंतोष का संकेत दे रहे हैं। पेंशन खर्च और कम होते अवसरों से उपजा यह तनाव यूरोपीय नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिसका असर भारत जैसे व्यापारिक साझेदारों पर भी पड़ सकता है।
यूरोप के कई देशों में युवाओं का गुस्सा सड़कों पर दिख रहा है। फ्रांस से लेकर सर्बिया तक, युवा पीढ़ी उस मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढांचे का विरोध कर रही है, जिसे वे बुजुर्गों के पक्ष में और युवाओं के खिलाफ मानते हैं। इस पूरे असंतोष के केंद्र में एक 'फिस्कल' (Fiscal) टकराव है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि सरकारी खजाना शिक्षा और बुनियादी ढांचे के बजाय पेंशन जैसी देनदारियों पर अधिक खर्च हो रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि यूरोपीय संघ में 18-24 आयु वर्ग के लोगों के लिए गरीबी और सामाजिक बहिष्कार का जोखिम पुरानी पीढ़ी की तुलना में काफी ज्यादा है। सरकारों के सामने अब बुजुर्ग मतदाताओं (जो अधिक वोट डालते हैं) और भविष्य की चिंता से जूझ रहे युवाओं के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यदि इन देशों में सामाजिक अस्थिरता बनी रहती है, तो भारत के इंजीनियरिंग गुड्स और फार्मा सेक्टर के एक्सपोर्ट पर सीधा असर पड़ सकता है।
यूरोप में कार्यरत भारतीय आईटी, ऑटोमोटिव और फार्मा कंपनियों को भी सतर्क रहना होगा। लेबर रेगुलेशन या सरकारी खर्च में बदलाव से इन कंपनियों के ऑपरेटिंग कॉस्ट पर दबाव बढ़ सकता है। भारत के पास जहां अपना 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' है, वहीं यूरोप की बुजुर्ग होती आबादी वहां के आर्थिक विकास के लिए बाधा बन रही है। ग्लोबल मार्केट पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यूरोपीय सरकारें अपने बजट में क्या बदलाव करती हैं और इसका असर ग्लोबल ट्रेड पर क्या पड़ता है।
