महंगाई का बढ़ता कहर
30 दिन पहले 28 फरवरी को शुरू हुए इस संघर्ष ने ग्लोबल इकोनॉमी के रास्ते बदल दिए हैं। एनर्जी सप्लाई के इस झटके ने उम्मीद से कहीं ज्यादा महंगाई बढ़ा दी है। इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) का अनुमान है कि G20 देशों में 2026 तक ग्लोबल हेडलाइन इन्फ्लेशन 4.0% तक पहुंच सकता है, जो पिछले अनुमानों से 1.2 फीसदी पॉइंट ज्यादा है। 2027 तक इसके घटकर 2.7% पर आने की उम्मीद है। प्रमुख शिपिंग रूट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में आई रुकावटें 1970s के 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation) यानी उच्च महंगाई और ठहरे हुए ग्रोथ की याद दिलाती हैं। यह बढ़ती महंगाई सेंट्रल बैंक्स के लिए इकोनॉमी को संभाले रखने में बड़ी चुनौती पेश कर रही है।
सप्लाई चेन में बड़े बदलाव, डिफेंस सेक्टर चमका
इन रुकावटों के चलते कंपनियां अब ग्लोबल सप्लाई चेन पर नए सिरे से विचार कर रही हैं। एफिशिएंसी (efficiency) से ज्यादा अब रेजिलिएंस (resilience) को प्राथमिकता दी जा रही है। नियर-शोरिंग (nearshoring), रीजियोनलाइजेशन (regionalization) और इन्वेंट्री (inventory) बढ़ाने जैसी रणनीतियां अपनाई जा रही हैं। टैरिफ (tariffs), जियो-पॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions) और बदलती ट्रेड पॉलिसी के कारण करीब दो-तिहाई सप्लाई चेन लीडर्स को लागत बढ़ने की आशंका है। यह बदलाव दशकों की हाइपर-ग्लोबलाइजेशन (hyper-globalization) से हटकर एक ज्यादा खंडित (fragmented) ग्लोबल इकोनॉमी की ओर इशारा करता है।
इस माहौल में डिफेंस सेक्टर (defense sector) जोरदार तेजी का अनुभव कर रहा है। बढ़ती जियो-पॉलिटिकल टेंशन और सरकारी खर्च में बढ़ोतरी, जैसे कि अमेरिका का प्रस्तावित $1.5 ट्रिलियन (trillion) का रक्षा बजट, डिफेंस स्टॉक्स को बढ़ावा दे रहे हैं। बड़े डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर आधुनिकरण और वैश्विक स्तर पर सैन्य तैयारी बढ़ाने के कारण मजबूत ऑर्डर बुक देख रहे हैं। यह स्थिति व्यापक औद्योगिक क्षेत्रों के बिल्कुल विपरीत है, जो उत्पादन में कमी, सप्लाई चेन की समस्याओं और अस्थिर एनर्जी कीमतों से जूझ रहे हैं। जर्मनी जैसे प्रमुख औद्योगिक केंद्र में ग्रोथ में भारी मंदी की आशंका है, जो 2026 के लिए उसके ग्रोथ अनुमानों को आधा कर सकती है।
आर्थिक कमजोरियां और नीतिगत चुनौतियां
कुछ मजबूती के बावजूद, ग्लोबल इकोनॉमी कई संरचनात्मक कमजोरियों का सामना कर रही है। एक बड़ी कमजोरी मिडिल ईस्ट (Middle East) से एनर्जी सप्लाई पर निर्भरता है, जिसे सामान्य होने में पांच साल तक का समय लग सकता है। यह लंबी रुकावट एनर्जी इम्पोर्ट करने वाले देशों, खासकर यूरोप के लिए स्टैगफ्लेशन (stagflation) का जोखिम बढ़ाती है। सेंट्रल बैंक्स मुश्किल स्थिति में हैं: इंटरेस्ट रेट्स (interest rates) बढ़ाना डिमांड को धीमा कर सकता है, लेकिन सप्लाई-ड्रिवन इन्फ्लेशन को ठीक करने में इसका कोई खास असर नहीं होता, जिससे इकोनॉमी को नुकसान का खतरा रहता है।
भारत जैसे देशों के लिए इन प्रभावों को मैनेज करना चुनौतीपूर्ण है। सरकारी प्रयास लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए किए जा रहे हैं, लेकिन विभिन्न जरूरी सामानों को संभालने की जटिलता एक बड़ी बाधा है। जर्मनी जैसी एक्सपोर्ट-निर्भर इकोनॉमी विशेष रूप से कमजोर है, जहां धीमी आर्थिक ग्रोथ और टैक्स रेवेन्यू में कमी के कारण 2029 तक बजट गैप €140 बिलियन (billion) तक पहुंच सकता है।
भविष्य की ओर: रिकवरी का लंबा रास्ता
2026 में ग्लोबल इकोनॉमी का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मिडिल ईस्ट (Middle East) का संघर्ष कितना लंबा और तीव्र रहता है। OECD ने इन लगातार दबावों का हवाला देते हुए ग्लोबल जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 2026 के लिए 2.9% और 2027 के लिए 3.0% तक घटा दिया है। यह संकट एनर्जी सिक्योरिटी (energy security) को भी नया आकार दे रहा है, जिससे कई देश पावर जनरेशन प्लान्स पर पुनर्विचार कर रहे हैं और संभवतः रिन्यूएबल्स (renewables) और एनर्जी एफिशिएंसी (energy efficiency) की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं, हालांकि कुछ कोयल (coal) की ओर वापसी की चिंता भी है। भविष्य के झटकों के लिए तैयार रहने और इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए डोमेस्टिक एनर्जी कैपेसिटी (domestic energy capacity) को बढ़ावा देना, सोर्स का डायवर्सिफिकेशन (diversification) करना और स्टोरेज (storage) में निवेश करना महत्वपूर्ण है।
1970s के एनर्जी संकटों से सीख मिलती है कि लंबी अवधि तक उच्च महंगाई, सीमित ग्रोथ और ग्लोबल इकोनॉमिक पावर में बदलाव संभव है। आज के बढ़ते जियो-पॉलिटिकल जोखिमों और नाजुक सप्लाई चेन से निपटने के लिए रणनीतिक अनुकूलन (strategic adaptation) और रेजिलिएंस (resilience) पर मजबूत फोकस की आवश्यकता होगी।