EU-Mercosur डील पर किसानों का 'गृह युद्ध'! यूरोप में बवाल, अब कोर्ट पहुंचा समझौता, सालों की देरी तय

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
EU-Mercosur डील पर किसानों का 'गृह युद्ध'! यूरोप में बवाल, अब कोर्ट पहुंचा समझौता, सालों की देरी तय
Overview

यूरोप और मर्कोसुर देशों के बीच बड़ा ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) फिलहाल अटक गया है। किसानों के उग्र विरोध और यूरोपीय कोर्ट ऑफ जस्टिस (ECJ) के पास जाने के कारण इस समझौते को लागू होने में सालों की देरी हो सकती है।

यूरोप और मर्कोसुर देशों के बीच हुआ बड़ा ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) फिलहाल एक बड़े संकट से गुज़र रहा है। इस डील, जिसका मकसद दुनिया के सबसे बड़े फ्री ट्रेड जोन (Free Trade Zones) में से एक बनाना था, को अब ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यूरोप भर के किसान, खासकर फ्रांस में, दक्षिण अमेरिकी देशों से आने वाले सस्ते कृषि उत्पादों से अपनी आजीविका (Livelihoods) पर खतरा महसूस कर रहे हैं। उन्हें डर है कि इससे उनके अपने उत्पादों की कीमत कम हो जाएगी। इस असंतोष ने सड़कों पर हिंसक प्रदर्शनों का रूप ले लिया है, जिससे मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर जाम हो गए हैं और किसान नीतियों पर पुनर्विचार (Policy reconsiderations) की मांग कर रहे हैं।

एक तरफ EU अपने ग्रीन और डिजिटल ट्रांजिशन (Green and digital transitions) के लिए ज़रूरी क्रिटिकल रॉ मैटेरियल्स (Critical raw materials) जैसे लिथियम और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare earth elements) के लिए चीन पर अपनी निर्भरता को 98% तक कम करना चाहता है। Mercosur देश (ब्राजील, अर्जेंटीना) इन महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े स्रोत हैं, जो EU को एक रणनीतिक विकल्प (Strategic alternative) दे सकते हैं। लेकिन, किसानों के इस भारी विरोध के बीच, यूरोपीय संसद (European Parliament) ने 21 जनवरी को इस समझौते को यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (ECJ) में न्यायिक समीक्षा (Judicial review) के लिए भेज दिया है। चिंताओं में EU के कानूनों और पर्यावरण मानकों का संभावित उल्लंघन भी शामिल है। इस कदम से डील के लागू होने की प्रक्रिया में दो साल तक की देरी हो सकती है, जब तक कि कोर्ट अपना फैसला नहीं सुना देता।

इस EU-Mercosur डील के तहत 90% से ज़्यादा सामानों पर टैरिफ (Tariffs) खत्म होने का प्रस्ताव था। वहीं, बीफ (Beef) और पोल्ट्री (Poultry) जैसी 'सेंसिटिव कमोडिटीज' (Sensitive commodities) के लिए टैरिफ-फ्री कोटे (Tariff-free quotas) भी तय किए गए थे। बीफ के लिए, हर साल 99,000 टन अतिरिक्त आयात की अनुमति होगी, जो EU के कुल उत्पादन का करीब 1.5% है। इन आयातों पर सेफगार्ड्स (Safeguards) भी लगाए गए हैं, जो तेज़ी से बढ़ते आयात या कीमत में 8% से ज़्यादा की गिरावट पर लागू हो सकते हैं। हालांकि, किसानों को ये सुरक्षा उपाय नाकाफी लग रहे हैं। यह सच है कि EU की GDP में कृषि क्षेत्र का योगदान केवल 1.2% है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह क्षेत्र बहुत प्रभावशाली है। कुछ अनुमानों के अनुसार, इस डील का EU की फार्म इनकम (Farm income) पर 1.6% की गिरावट का असर पड़ सकता है, खासकर मांस उत्पादन पर निर्भर क्षेत्रों में।

फिलहाल, इस डील का भविष्य पूरी तरह यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (ECJ) के फैसले और सदस्य देशों की मंज़ूरी पर टिका है। यह पूरा मामला EU के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ी करता है – एक तरफ वैश्विक रणनीतिक हितों को साधना और दूसरी तरफ अपने घरेलू कृषि क्षेत्र के राजनीतिक दबावों को संभालना। किसानों का विरोध यह दिखाता है कि उनका प्रभाव EU की व्यापार नीतियों को तय करने में कितनी बड़ी भूमिका निभाता है।

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