चीन के युवा प्रोफेशनल अब माओत्से तुंग की विचारधारा की ओर रुख कर रहे हैं। रिकॉर्ड बेरोजगारी और जॉब मार्केट में मंदी के बीच यह बदलाव ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए चिंता का सबब बन गया है।
चीन की युवा पीढ़ी के बीच एक बड़ा वैचारिक बदलाव देखने को मिल रहा है। वर्कप्लेस के भारी दबाव और आर्थिक सुस्ती से परेशान युवा अब माओत्से तुंग के लेखों और विचारों में अपना समाधान ढूंढ रहे हैं। यह सिर्फ इतिहास की वापसी नहीं, बल्कि उस हाई-स्पीड ग्रोथ मॉडल से मोहभंग का संकेत है, जिस पर दशकों से चीन टिका हुआ था।
आंकड़ों में छिपी चिंता
जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, चीन में युवाओं की बेरोजगारी दर करीब 17.9% पर पहुंच गई है। चुनौती तब और बढ़ जाती है जब हम देखते हैं कि 2026 के ग्रेजुएशन सीजन में करीब 1.27 करोड़ नए ग्रेजुएट्स लेबर मार्केट में उतरे हैं। अच्छी नौकरियों की कमी और रियल एस्टेट सेक्टर के कर्ज में डूबने के कारण युवा अब 'हसल कल्चर' (hustle culture) से दूर हो रहे हैं।
ग्लोबल मार्केट पर असर
निवेशकों के नजरिए से देखें, तो यह ट्रेंड चिंताजनक है। चीन का मैन्युफैक्चरिंग मॉडल एक ऐसी युवा आबादी पर निर्भर था, जो लंबी शिफ्ट में काम करने के लिए तैयार रहती थी। यदि यह वर्ग 'लाइंग फ्लैट' (lying flat) यानी काम से दूरी बनाने जैसी विचारधारा अपनाता है, तो इससे मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्टिविटी और वेज उम्मीदों पर सीधा असर पड़ेगा। यही कारण है कि कई ग्लोबल कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन के लिए 'China+1' स्ट्रेटजी अपना रही हैं और भारत जैसे बाजारों की ओर देख रही हैं।
आगे क्या?
यह शिफ्ट भविष्य में चीन की घरेलू खपत के पैटर्न को भी बदल सकती है। स्टेटस-सिंबल वाले ग्लोबल ब्रांड्स के बजाय युवा अब घरेलू और वैल्यू-ओरिएंटेड विकल्पों की ओर बढ़ सकते हैं। अब सबकी नजरें चीन के सरकारी नीतिगत फैसलों पर हैं, जो यह तय करेंगे कि वे इस जॉब मार्केट सैचुरेशन को कैसे संभालते हैं। ग्लोबल इन्वेस्टर्स अब मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और लेबर पार्टिसिपेशन डेटा पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
