व्यापार युद्ध का नया मोर्चा: ग्रीन टेक
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, चीन और अमेरिका, के बीच व्यापारिक तनातनी का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय (Ministry of Commerce) ने अमेरिका द्वारा चीन के 'ग्रीन टेक' यानी पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों के आयात पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ एक व्यापक जांच शुरू की है। विश्लेषकों का मानना है कि यह जांच चीन को अमेरिका के नए टैरिफ (tariffs) का जवाब देने के लिए एक कानूनी आधार प्रदान करती है। यह कदम विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की चीन यात्रा निकट है। अमेरिका ने पहले भी चीनी उद्योगों को निशाना बनाते हुए महत्वपूर्ण टैरिफ लगाए हैं, जिसमें इलेक्ट्रिक-व्हीकल (EV) बैटरी पर 25% और खुद EVs पर 100% शुल्क शामिल है, साथ ही सोलर पैनल पर भी ऐसे ही शुल्क लगे हैं। इसी बीच, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के एक पैनल ने हाल ही में चीन की शिकायत पर अमेरिका के खिलाफ फैसला सुनाया है। पैनल ने पाया कि अमेरिका की क्लीन एनर्जी सब्सिडी, विशेष रूप से 'इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट' (IRA) के तहत, चीनी टेक्नोलॉजी के साथ अनुचित भेदभाव करती है। डब्ल्यूटीओ पैनल ने अमेरिका को 1 अक्टूबर, 2026 तक घरेलू सामग्री सब्सिडी वापस लेने का आदेश दिया है, जिसे चीन ने वैश्विक व्यापार नियमों के बचाव और अमेरिकी प्रोटेक्शनिज़्म (protectionism) के खिलाफ एक जीत बताया है।
चीन के लिए क्यों अहम है ग्रीन एक्सपोर्ट?
चीन की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी का निर्यात (export) अब एक प्रमुख सहारा बन गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2025 में क्लीन-एनर्जी सेक्टरों ने चीन के कुल आर्थिक विकास (economic growth) में एक-तिहाई से अधिक का योगदान दिया और निवेश में वृद्धि (investment gains) का 90% से अधिक इन्हीं सेक्टरों से आया। इन उद्योगों के प्रदर्शन के बिना, चीन अपने आधिकारिक जीडीपी (GDP) ग्रोथ लक्ष्यों को हासिल करने में पीछे रह जाता। पिछले साल ग्रीन प्रोडक्ट एक्सपोर्ट ने एक नया रिकॉर्ड बनाया, और यह सिलसिला जारी रहा। अगस्त 2025 में एक्सपोर्ट 20 बिलियन USD के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसका मुख्य कारण इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) एक्सपोर्ट में 26% और बैटरी एक्सपोर्ट में 23% की साल-दर-साल वृद्धि रही। चीन की महत्वाकांक्षाएं स्पष्ट हैं: 2030 से पहले उत्सर्जन में पीक (peak emissions) हासिल करना और 2060 तक कार्बन न्यूट्रेलिटी (carbon neutrality) प्राप्त करना।
मैन्युफैक्चरिंग का दम: चीन की बड़ी ताकत
चीन की यह रणनीतिक जांच उसकी वैश्विक ग्रीन टेक मैन्युफैक्चरिंग (manufacturing) में मजबूत पकड़ से और भी सशक्त होती है। वर्तमान में, चीन वैश्विक सोलर पीवी (PV) मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का लगभग 75% हिस्सा रखता है, और 2030 तक यह 55-65% रहने का अनुमान है। विंड नैकेले (wind nacelle) मैन्युफैक्चरिंग में इसकी हिस्सेदारी 60% से अधिक है, और 2030 तक ऑफशोर (offshore) उपकरणों के लिए यह 70-80% तक पहुंचने की उम्मीद है। इलेक्ट्रोलाइजर्स (electrolyzers) के मामले में, चीन के पास लगभग 40% मैन्युफैक्चरिंग क्षमता है, और बैट्री उत्पादन में यह दुनिया का लगभग 80% हिस्सा संभालता है। इस मैन्युफैक्चरिंग ताकत का नतीजा कम लागत के रूप में मिलता है, जो बड़े पैमाने पर उत्पादन (economies of scale), ऑटोमेशन (automation), और कम ऊर्जा व श्रम लागत से संभव होता है। चीन 200 से अधिक देशों और क्षेत्रों को सेवा प्रदान करता है, जिससे उसका एक्सपोर्ट बेस काफी बड़ा हो जाता है और अन्य देशों के लिए जल्दी से वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता ढूंढना मुश्किल हो जाता है। देश रणनीतिक रूप से अपने एक्सपोर्ट फोकस को भी बदल रहा है, जहाँ 2021 से 2024 के बीच सोलर, विंड और EV एक्सपोर्ट में 70% वृद्धि उभरते बाजारों से हुई है।
ओवरकैपेसिटी और टैरिफ का खतरा
अपनी मैन्युफैक्चरिंग की धाक के बावजूद, चीन के ग्रीन टेक सेक्टर को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, खासकर सोलर और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में लगातार बनी हुई ओवरकैपेसिटी (overcapacity)। इससे प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) पर दबाव पड़ा है और कीमतें गिरी हैं। वहीं, अमेरिका ने एक दशक से अधिक समय से चीनी ग्रीन एनर्जी इंपोर्ट पर टैरिफ लगाए हुए हैं, जिसमें EVs पर 100% और बैट्री पर 25% जैसे संरक्षणवादी उपाय शामिल हैं। हालिया डब्ल्यूटीओ (WTO) के फैसले ने अमेरिका की सब्सिडी को गलत ठहराया है, जो चीन के लिए एक जीत है। लेकिन यह वैश्विक व्यापार नियमों और औद्योगिक नीति (industrial policy) की विवादास्पद प्रकृति को भी उजागर करता है। अमेरिका ने इस फैसले की आलोचना की है और तर्क दिया है कि डब्ल्यूटीओ के नियम चीन की 'अतिरिक्त क्षमता' (excess capacity) से निपटने के लिए अपर्याप्त हैं। एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की वेंडी कटलर ने कहा कि चीन ने संकेत दिया है कि "हमारा बंदूक लोड है और हम जवाबी कार्रवाई (retaliate) के लिए तैयार हैं।" अमेरिका द्वारा अलग टेक पाथ (tech paths) अपनाने से वैश्विक सहयोग को नुकसान पहुंच सकता है और भविष्य में उसकी तकनीकी बढ़त कमजोर हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, अमेरिकी-चीन व्यापार तनाव का मिश्रित प्रभाव पड़ा है; कभी-कभी इसने भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण क्लीन एनर्जी निवेश को बढ़ावा दिया है, लेकिन इसने बाजार में महत्वपूर्ण व्यवधान (disruptions) भी पैदा किए हैं।
चीन का बड़ा जलवायु संदेश
व्यापारिक विवादों से परे, चीन की यह जांच एक बड़ा भू-राजनीतिक (geopolitical) संदेश भी भेजती है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन यह तर्क दे रहा है कि अमेरिकी औद्योगिक नीति वैश्विक जलवायु कार्रवाई (climate action) में बाधा डालती है। यह संदेश वाशिंगटन की बजाय यूरोप और उभरते बाजारों के लिए अधिक लक्षित है। बीजिंग खुद को तेज और सस्ती क्लीन एनर्जी को बढ़ावा देने वाले के रूप में पेश कर रहा है, जबकि अमेरिका के 'अव्यवस्थित और संरक्षणवादी दृष्टिकोण' की आलोचना कर रहा है। यह नैरेटिव चीन की जलवायु वार्ता (climate talks) की बयानबाजी के अनुरूप है, जो वैश्विक उत्सर्जन को कम करने में अपनी भूमिका पर जोर देता है। चूंकि चीन वैश्विक क्लीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग पर हावी है, सप्लाई चेन (supply chains) काफी हद तक उसके उत्पादन पर निर्भर करती हैं। इससे कंपनियों के लिए अन्य आपूर्तिकर्ताओं के पास स्विच करना मुश्किल हो जाता है। 2030 तक वैश्विक क्लीन एनर्जी निवेश 4.5 ट्रिलियन USD सालाना से अधिक होने की उम्मीद है, ऐसे में चीन का प्रभाव बढ़ेगा। यह तब और भी सच है जब वह क्लीन एनर्जी के लिए अपने दीर्घकालिक, नीति-संचालित दृष्टिकोण की तुलना अमेरिका के अल्पावधि फोकस और जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) के समर्थन से करता है। यह जांच वास्तव में वैश्विक व्यापार गतिशीलता (global trade dynamics) को प्रभावित करने और डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) के भविष्य को आकार देने के लिए चीन के औद्योगिक ताकत का उपयोग करने का एक सोची-समझी चाल है।