नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के लिए चीन ने अपने तिब्बत स्थित हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर को जिम्मेदार मानने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि वैज्ञानिक रिपोर्टों में प्राकृतिक आपदा को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में चल रही बड़ी परियोजनाओं की सुरक्षा पर सवाल जरूर खड़े हो गए हैं।
चीन ने आधिकारिक तौर पर उन दावों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि 26 अगस्त 2026 को नेपाल-चीन सीमा पर आई बाढ़ के पीछे उनके तिब्बत स्थित बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स का हाथ है। इस आपदा में भारी जन-धन की हानि हुई है, जिसके बाद हिमालयी कॉरिडोर में चल रहे बड़े निर्माण कार्यों की सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव की कड़ी समीक्षा हो रही है।
बीजिंग के अधिकारियों ने उन आरोपों को निराधार बताया है, जिनमें कहा गया था कि बांधों के संचालन की वजह से यह त्रासदी हुई। इसके विपरीत, क्षेत्रीय मॉनिटरिंग बॉडीज और वैज्ञानिकों का मानना है कि यह घटना मुख्य रूप से एक प्राकृतिक आपदा थी, जो संभवतः ग्लेशियर के टूटने या बर्फ-चट्टान के गिरने से हुई है, न कि किसी मानवीय भूल के कारण।
ब्रह्मपुत्र मेगा-डैम पर फिर छिड़ी बहस
इस घटना ने $167.8 बिलियन की लागत वाली ब्रह्मपुत्र नदी मेगा-डैम परियोजना पर फिर से चर्चा छेड़ दी है। यह प्रोजेक्ट एक सक्रिय भूकंपीय फॉल्ट लाइन (seismic fault line) पर स्थित है, जो पर्यावरणविदों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। हालांकि चीन का कहना है कि निर्माण कार्य में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन किया गया है, लेकिन भूगर्भीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे विशाल ढांचे की मौजूदगी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भविष्य की चिंताएं
यह त्रासदी न केवल भू-राजनीतिक तनाव को बढ़ा रही है, बल्कि जल साझा करने और आपदा प्रबंधन डेटा को लेकर नेपाल और चीन के बीच के आपसी तालमेल पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में पर्यावरणीय स्थिरता और सेकेंडरी आपदाओं, जैसे कि बैरियर लेक के बनने का खतरा, निवेशकों और क्षेत्रीय नीति निर्माताओं के लिए आने वाले समय में मुख्य चिंता का विषय रहेगा।
