China और Bhutan ने थिम्पू में बॉर्डर वार्ता का 16वां दौर पूरा कर लिया है। 'थ्री-स्टेप रोडमैप' के जरिए **477 किमी** लंबी सीमा को सुलझाने की कोशिश भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका सीधा असर सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
हाल ही में थिम्पू में आयोजित एक्सपर्ट ग्रुप मीटिंग में चीन और भूटान ने अपने पुराने सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए हैं। दोनों देशों ने 477 किलोमीटर लंबी साझा सीमा के सीमांकन के लिए 'थ्री-स्टेप रोडमैप' को जारी रखने पर सहमति जताई है। इस वार्ता में हाई-लेवल पॉलिसी चर्चा के अलावा जॉइंट टेक्निकल टीम ने भी हिस्सा लिया, जो जमीनी स्तर पर मैपिंग के तकनीकी पहलुओं पर काम कर रही है। फिलहाल फोकस उन इलाकों पर है जहां विवाद कम है, ताकि बाद में जटिल क्षेत्रीय दावों को सुलझाया जा सके।
भारत के लिए क्या हैं मायने?
भारतीय निवेशकों और नीति-निर्माताओं के लिए ये बातचीत बेहद संवेदनशील है। डोकलाम पठार, जो भारत, चीन और भूटान का ट्राई-जंक्शन है, रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह इलाका 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (जिसे सिलीगुड़ी नेक भी कहा जाता है) के काफी करीब है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।
मार्केट सेंटिमेंट पर असर
क्षेत्रीय स्थिरता का सीधा असर नेशनल सिक्योरिटी और डिफेंस से जुड़ी परियोजनाओं पर पड़ता है। हालांकि कूटनीति के स्तर पर सब सामान्य दिख रहा है, लेकिन सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास चीन की किसी भी गतिविधि पर भारत की पैनी नजर है। सीमा पर स्पष्टता आने से द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो सकता है, लेकिन अगर विवाद बढ़ता है, तो यह लॉन्ग-टर्म रिस्क के तौर पर देखा जाएगा। डिफेंस और इंफ्रा सेक्टर से जुड़े निवेशकों के लिए इन वार्ताओं के नतीजे पर नजर रखना जरूरी है क्योंकि पूर्वोत्तर की स्थिरता ही कई बड़े प्रोजेक्ट्स की नींव है।
