जर्मनी के चांसलर Friedrich Merz पर चुनावी हार के बाद दबाव बढ़ गया है। Mecklenburg-Western Pomerania और Berlin में मिली हार के बाद, केवल **12** सीटों के पतले बहुमत के साथ पेंशन और आर्थिक सुधारों को पास कराना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
चांसलर Friedrich Merz के लिए यह दौर बेहद चुनौतीपूर्ण है। सत्ता में 16 महीने पूरे होने के बाद उनकी पार्टी Christian Democratic Union को स्थानीय चुनावों में मिली हार ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। निवेशकों को सबसे बड़ा डर यह है कि बर्लिन में पैदा हुआ यह राजनीतिक गतिरोध कहीं आर्थिक सुधारों को पूरी तरह ठप न कर दे।
सरकार की राह में '12 सीटों' की बाधा
मुख्य चिंता का कारण 630 सदस्यों वाली Bundestag में सरकार का बेहद पतला बहुमत है। सरकार के पास केवल 12 सीटों का बफर है, जिसके कारण पेंशन सिस्टम में बदलाव जैसे बड़े रिफॉर्म्स को लागू करना अब पहले से कहीं अधिक मुश्किल हो गया है। गठबंधन में शामिल सहयोगियों के बीच बढ़ती असहमति और चुनावी हार का असर अब फैसलों की रफ्तार पर पड़ सकता है।
ग्लोबल मार्केट पर असर
जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और एक बड़ा ट्रेड पार्टनर भी है। बर्लिन में लंबे समय तक रहने वाली राजनीतिक अनिश्चितता पूरे यूरोप के ग्रोथ सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकती है। यदि रिफॉर्म्स में देरी होती है, तो इसका सीधा असर यूरोप के इक्विटी मार्केट्स के कॉन्फिडेंस पर पड़ सकता है।
अभी तक मर्ज़ के खिलाफ कोई बड़ा उत्तराधिकारी सामने नहीं आया है, लेकिन वसंत ऋतु में होने वाले अगले दौर के चुनावों पर सबकी नजरें टिकी होंगी। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या चांसलर अपने गठबंधन को एक साथ रख पाते हैं या फिर आगे की चुनावी हार सरकार की नीतियों में बड़ा बदलाव लाने के लिए मजबूर कर देगी।
