मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच Brent Crude के दाम **7 हफ्ते** की ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। तेल के भाव **$97** प्रति बैरल के पास हैं, जिससे भारतीय निवेशकों के लिए महंगाई और रुपये पर दबाव का बड़ा रिस्क खड़ा हो गया है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में आज भारी हलचल है। मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण Brent Crude के दाम उछलकर $97 प्रति बैरल के करीब पहुंच गए हैं। यह तेजी दक्षिणी लेबनान में हुए हमलों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सऊदी अरब के टैंकर 'सिद्र' (Sidr) पर हुए हमले के बाद देखी गई है, जिससे एनर्जी सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल मिडिल ईस्ट से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में इजाफा भारत के लिए 'इंपोर्ट बिल' को बढ़ा देता है, जिसका सीधा असर रुपये की वैल्यू और महंगाई दर (Inflation) पर पड़ता है। निवेशकों को मुख्य रूप से तीन सेक्टरों पर नजर रखने की जरूरत है:
ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs): जब कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ते हैं, तो इन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आता है। पेट्रोल पंपों पर कीमतें न बढ़ने की स्थिति में सीधा असर उनके नेट प्रॉफिट पर दिखता है।
एविएशन सेक्टर: एयरलाइंस के लिए फ्यूल (ATF) सबसे बड़ा खर्चा होता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें एयरलाइंस के ऑपरेटिंग मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं।
पेंट, टायर और केमिकल कंपनियां: इन उद्योगों में कच्चे तेल के डेरिवेटिव्स का उपयोग कच्चे माल के रूप में होता है। लागत बढ़ने पर ये कंपनियां या तो अपना मुनाफा कम करती हैं या कीमतें बढ़ाती हैं, जिससे डिमांड में कमी आ सकती है।
इसके अलावा, लंबे समय तक तेल महंगा रहने पर लॉजिस्टिक और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ेगी, जो देश में महंगाई को और हवा देगी। इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) पर फैसला लेना और कठिन हो जाएगा। फिलहाल, मार्केट की नजरें होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर टिकी हैं, क्योंकि यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऑयल ट्रांजिट रूट है।
