मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच Brent Crude की कीमतें **$90** प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। UAE द्वारा ईरानी ड्रोन को गिराए जाने और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ती तनातनी का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ना तय है।
बाजार पर क्या होगा असर?
मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनाव अब एनर्जी मार्केट्स को हिला रहा है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा ईरानी ड्रोन को मार गिराने और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव ने हालात बिगाड़ दिए हैं। फरवरी 2026 से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 25% का उछाल दर्ज किया गया है।
भारतीय कंपनियों के लिए खतरा (Risk Factors)
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय रुपये पर दबाव डालती हैं और महंगाई बढ़ाती हैं। निवेशकों को मुख्य रूप से दो सेक्टरों पर नजर रखनी चाहिए:
- OMCs (तेल विपणन कंपनियां): अगर कंपनियां बढ़ती लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाती हैं, तो उनके रिफाइनिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा।
- इनपुट-सेंसिटिव सेक्टर: पेंट, केमिकल और एविएशन कंपनियों के लिए कच्चा तेल कच्चा माल (Raw Material) होता है। लागत बढ़ने से उनके नेट प्रॉफिट में गिरावट आ सकती है, जब तक कि वे अपने प्रोडक्ट की कीमतें न बढ़ाएं।
ग्लोबल समीकरण और रणनीतिक मोर्चे
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया भर में तेल की आपूर्ति का मुख्य मार्ग है, और वहां सैन्य गतिविधियां बढ़ने से ग्लोबल सप्लाई चेन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। भले ही USS अब्राहम लिंकन क्षेत्र से हट गया हो, लेकिन इजराइल-ग्रीस के बीच 3 अरब यूरो की रक्षा डील और तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी अरब के नए रक्षा गठबंधन से क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
आने वाले दिनों में निवेशकों को वैश्विक एनर्जी कीमतों की वोलाटिलिटी (Volatility) पर बारीक नजर रखनी होगी। बाजार अब यह देखेगा कि तेल पर निर्भर भारतीय कंपनियां अपने मार्जिन को कैसे मैनेज करती हैं।
