बेल्जियम के प्रधानमंत्री Bart De Wever ने स्वीकार किया है कि यूरोप ने भारत की उन चेतावनियों को नजरअंदाज किया, जिनमें सप्लाई चेन को लेकर जोखिम की बात कही गई थी। यह बदलाव निवेशकों के लिए रक्षा (Defense), सेमीकंडक्टर और क्लीन एनर्जी सेक्टर में नए मौके लेकर आया है।
भारत के दौरे पर आए बेल्जियम के प्रधानमंत्री Bart De Wever ने दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि यूरोपीय देश अपनी ग्लोबल ट्रेड निर्भरता की कमजोरियों को समझने में काफी पीछे रहे। उन्होंने खुलकर माना कि यूरोप ने पहले भारत की ओर से दी गई उन चेतावनियों को अनसुना किया था, जिनमें सिंगल-सोर्स मार्केट पर निर्भर रहने के खतरों के बारे में बताया गया था।
यूरोप की बदलती आर्थिक रणनीति
यह बयान यूरोप की आर्थिक रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब जब यूरोप अपनी इंडस्ट्रियल बेस को सुरक्षित करने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है, तो भारत उनके लिए मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी पार्टनर के तौर पर एक बड़ा विकल्प बनकर उभर रहा है। यह बदलाव उन भारतीय सेक्टरों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है जो यूरोप की मैन्युफैक्चरिंग जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।
किन सेक्टरों पर रहेगी नजर?
इस डिप्लोमैटिक मुलाकात में फोकस हाई-ग्रोथ वाले सेक्टरों पर रहा, जिनमें सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स और क्लीन एनर्जी शामिल हैं। सबसे बड़ा आउटकम डिफेंस सहयोग के लिए 'लेटर ऑफ इंटेंट' का आदान-प्रदान रहा। सरकार के बीच हुए ऐसे समझौते अक्सर भविष्य में बड़ी भागीदारी का आधार बनते हैं, जिससे डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी से जुड़ी भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाजारों के दरवाजे खुल सकते हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालांकि, यह लॉन्ग-टर्म के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन निवेशकों को इसके इंप्लीमेंटेशन फेज को लेकर व्यावहारिक रहने की जरूरत है। डिफेंस और सेमीकंडक्टर जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में अप्रूवल और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लंबा समय लगता है। पॉलिसी से लेकर कंपनियों की बैलेंस शीट पर असर दिखने तक का सफर काफी धीरे-धीरे चलता है।
आगे क्या होगा?
अब बाजार की नजरें India-EU Free Trade Agreement की प्रगति पर टिकी हैं। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कैसे ये सरकारी समझौते आगे चलकर जॉइंट वेंचर्स या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर डील्स में बदलते हैं।
