ढाका में ऊर्जा संकट के बीच जारी प्रदर्शनों और दिसंबर 2026 में खत्म होने वाली 'गंगा जल संधि' ने भारत के लिए भू-राजनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसका सीधा असर सीमा पार व्यापार और लॉजिस्टिक्स पर पड़ सकता है।
बिगड़ते हालात का व्यापार पर साया
ढाका की सड़कों पर जारी विरोध प्रदर्शनों की मुख्य वजह वहां गहराता ऊर्जा संकट है। 'नेशनल सिटीजन पार्टी' जैसे राजनीतिक समूह इस स्थिति का इस्तेमाल भारत विरोधी भावनाएं भड़काने के लिए कर रहे हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से एक बड़ा संकेत है। निवेशकों के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित करती है, बल्कि सीमा पार आर्थिक गतिविधियों के लिए भी एक रिस्क फैक्टर है।
गंगा जल संधि: एक बड़ी चुनौती
सबसे अहम मुद्दा 12 दिसंबर, 2026 को समाप्त होने वाली 'गंगा जल संधि' (Ganga Water Sharing Treaty) है। 1996 में हस्ताक्षरित यह संधि फरक्का बैराज पर पानी के बहाव को नियंत्रित करती है। दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर है, इसलिए नई फ्रेमवर्क तैयार करने को लेकर सरकार पर भारी दबाव है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं रिस्क?
भारत और बांग्लादेश के बीच टेक्सटाइल, कंज्यूमर गुड्स और एनर्जी सेक्टर में बड़ा कारोबार होता है। इसके अलावा, सिलीगुड़ी कॉरिडोर (Siliguri Corridor) के जरिए पूर्वोत्तर भारत में माल की सप्लाई होती है। अगर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध प्रभावित होते हैं, तो लॉजिस्टिक लागत में इजाफा होना तय है।
निवेशकों को सलाह है कि वे आगामी संधि वार्ता और सीमा पार पावर प्रोजेक्ट्स से जुड़ी अपडेट्स पर नजर रखें। दोनों देशों की सरकारों के बीच तालमेल ही आने वाले समय में आर्थिक स्थिरता तय करेगा।
