Bangladesh ने भारत के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने का संकेत दिया है। पिछले 15 वर्षों के जुड़ाव से अलग, अब ढाका अपनी फॉरेन पॉलिसी में बड़े बदलाव की तैयारी में है, जिसका असर क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड और एनर्जी सप्लाई पर पड़ सकता है।
बांग्लादेश सरकार ने आधिकारिक रूप से भारत के साथ अपने कूटनीतिक रुख में बदलाव का ऐलान कर दिया है। 13 सितंबर 2026 को स्टेट मिनिस्टर फॉर फॉरेन अफेयर्स हुमायूं कबीर ने साफ किया कि ढाका अब पिछले 15 वर्षों के एंगेजमेंट मॉडल से बाहर निकलना चाहता है। इस नई नीति का मकसद 'इंडिया-सेंट्रिक' फॉरेन पॉलिसी को छोड़कर एक संतुलित और नेशनल सोवरेनिटी पर आधारित दृष्टिकोण अपनाना है।
निवेशकों की चिंता क्यों?
भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत आर्थिक निर्भरता है, खासकर एनर्जी सेक्टर में। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश की कुल बिजली खपत का करीब 15.6% हिस्सा भारत से आता है। ऐसे में कूटनीतिक तनाव का सीधा असर बिजली आपूर्ति समझौतों, पेमेंट टाइमलाइन और उन भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है, जो वहां पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर और कंज्यूमर गुड्स में काम कर रही हैं।
राजनीतिक तनाव और भविष्य की राह
अगस्त 2024 में हुए सत्ता परिवर्तन और पूर्व पीएम शेख हसीना के भारत में रहने को लेकर ढाका ने अपनी असहमति जताई है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। यही कारण है कि बांग्लादेश अब मल्टीलेटरल फोरम के बजाय सीधे सरकारी स्तर (G2G) पर बातचीत को प्राथमिकता दे रहा है, जिसका उदाहरण ब्रिक्स समिट से दूरी बनाना है।
अब सबकी नजरें 22 सितंबर 2026 को शुरू होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) पर हैं, जहां पीएम तारिक रहमान शामिल होंगे। मार्केट के जानकारों के लिए देखने वाली बात यह होगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों देशों के बीच ट्रेड एग्रीमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लेकर कोई स्पष्टता आती है या अनिश्चितता का दौर जारी रहता है।
